दिव्य विचार: कष्ट पहुंचाओगे तो वापस ही मिलेगा- मुनिश्री चन्द्रप्रभ जी महाराज
मुनिश्री चन्द्रप्रभ महाराज जी कहते हैं कि जो आज दूसरों को कष्ट पहुँचा रहा है, वह क्यों नहीं सोचता कि दूसरा भी उसे कभी कष्ट पहुँचा सकता है ? जितनी पीड़ा तुम्हें हो रही है, उतनी ही पीड़ा उसे भी होगी। जो धर्म के नाम पर पशुओं की बलि देते हैं, वे यह क्यों नहीं सोचते कि अगर हमारे पाँव में काँटा भी गड़ जाए तो कितना कष्ट होता है ? तब उस पशु को कितनी वेदना होगी ? तुम्हारे बच्चे को इंजेक्शन लगाना पड़ता है तो तुम दहल जाते हो, लेकिन कटु वाणी बोलते समय, लड़ाई-झगड़ा करते, किसी का शोषण करते, धन ऐंठते और न जाने ऐसे कितने कर्म करते जरा भी ध्यान नहीं रखते कि इनसे दूसरों को कितना कष्ट हो रहा है? तुम भूल ही जाते हो कि तुम्हारे इस तरह के कार्य अन्यों को कितनी पीड़ा पहुँचा रहे हैं? जिसके मन में यह भाव हो कि वह किसी को कष्ट क्यों पहुँचाये, पीड़ा क्यों दे, वही शुभ विचारों और शुभ लेश्याओं का स्वामी होता है। वह सोचता है कि यदि दूसरा मुझे कष्ट पहुँचाये तो क्या मुझे अच्छा लगेगा ? अगर हम स्वयं किसी के द्वारा कष्ट नहीं चाहते तो कृपया, आप भी किसी को कष्ट मत दीजिए। आज सबकी प्रायः यही प्रवृत्ति हो गई है कि हमारा सुख तो हमारा रहे ही, दूसरों का सुख भी हमारा हो जाय। यह उनका कदाग्रह है कि दूसरे का भी मिल जाये और नहीं मिले तो उसे हड़प लें। मित्र, तुम भी सुख से जिओ तथा और लोग भी सुख से जियें, तभी अहिंसा-धर्म जीवित होगा। भगवान ने छः राहगीरों के रूप में छः लेश्याएं वर्णित कीं- कृष्ण, नील, कपोत, तेजस्, पद्म और शुक्ल लेश्या । ये जो छः किस्म के लोग हैं जो हम में भी होते हैं, वे छः लोग इन छः लेश्याओं के सूचक हैं। मैं बहुत संक्षेप में इनके बारे में कहूँगा। आप स्वयं देख लें कि आप किस लेश्या से सम्बन्धित व्यक्ति हैं ? यदि हो सके तो स्वयं को उस लेश्या से बाहर लाने का प्रयास करें। उससे अगली लेश्या में जाने का प्रयास करें। लेश्या यानी जो आश्लिष्ट कर ले। जो घेर ले, जो हम पर हावी हो जाए, वह लेश्या है। मन की वह धारा, वह विचार, वह वृत्ति, जो हम पर हावी हो जाए, प्रभावी हो जाए, वह लेश्या है।






