दिव्य विचार: सद्गुणों को हमेशा ग्रहण करें- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि दूसरों के गुणों को देखना शुरू कर दो और देख करके क्या करो ? दो तरह की बातें होती हैं जो दूसरे के गुणों को देखकर जल उठते हैं और कुछ लोग ऐसे होते हैं जो दूसरे के गुणों को देखकर खिल उठते हैं। गुणों को देखकर जला भी जा सकता है और गुणों को देखकर खिला भी जा सकता है। गुणविद्वेषी गुणों को देखकर जल उठता है और गुणानुरागी गुणी को देखकर खिल उठता है । हम गुणविद्वेषी न बनें, गुणानुरागी बनें। गुणानुरागी बनने का मतलब सामने वाले के गुणों के ग्रहण करने की भावना मन में रखें। गुणों को ग्रहण करने की भावना अगर हम रखेंगे तो गुणवान हमारा आदर्श बनेगा और गुणों से द्वेष रखेंगे, तो गुणवान हमारा प्रतिद्वन्द्वी बनेगा। ध्यान रखना, हम किसी को अपने प्रतिद्वन्द्वी की तरह खड़ा न करें, उसे अपने आदर्श के रूप में खड़ा करें। चाहे वह हमारा कितना भी विरोधी और विपक्षी ही क्यों न हो ? धर्मात्मा की दृष्टि यही होती है। गुणानुरागी दृष्टि है तो सब काम होगा। गुणों के प्रति अनुराग रखोगे तो तुम्हारे भीतर के गुण विकसित होंगे। तुम्हारी आत्मा में उज्ज्वलता और निर्मलता प्रकट होगी और दुर्भावनाओं को अपने आपसे मुक्त करने में सक्षम हो सकोगे। यह विचार करो कि किसी के प्रति नफरत के बीज बोकर हासिल क्या होता है ? घृणा किसी से कर रहे हो, द्वेष कर रहे हो तो मन को कितना सुकून मिल रहा है ? विचार करके देखो, जिसके प्रति प्रेम होता है उसके सम्बन्ध में विचार करने में प्रसन्नता की अनुभूति होती है। अथवा जिसके प्रति विद्वेष होता है उसके प्रति विचार करने में आपको ज्यादा प्रसन्नता की अनुभूति होती है। किसमें आपको अच्छा अहसास होता है ? प्रेमी के प्रति सोचने में या शत्रु के प्रति सोचने में ? यदि प्रेमी के प्रति सोचने से प्रसन्नता की अनुभूति होती है तो शत्रुओं की संख्या को घटाना शुरू कर दो। प्रेमी का सामीप्य आप चाहते हो और शत्रुओं की संख्या आप बढ़ाते हो तो कैसे काम होगा ? जीव में सुख, शान्ति और चैन का अनुपात बढ़ाना है, तो दुर्भावों को दूर करने का यत्न करें और सद्भावों के बीज बोना प्रारम्भ कर दीजिये।






