दिव्य विचार: एक दूसरे के प्रति स्नेह और वात्सल्य रखो- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि हमारे शरीर में हृदय का महत्त्वपूर्ण स्थान है। जब तक हृदय की धड़कन स्पन्दन है, तब तक जीवन है। धड़कन समाप्त, जीवन समाप्त । सन्त कहते हैं- शरीर में जो स्थान हृदय का है, धर्म में वही स्थान वात्सल्य का है। प्रेम और वात्सल्य हमारे धर्म की धड़कन हैं। उसके रहते हमारे जीवन में धार्मिकता पल सकती है और उसके अभाव में हमारा जीवन धर्मशून्य हो जाता है। जैसे हृदय के स्पन्दन से रहित व्यक्ति का शरीर शव हो जाता है वैसे ही प्रेम शून्य व्यक्ति का जीवन भी शव के समान माना गया है। कहा जा सकता है कि जिस मनुष्य के अन्तरंग में प्रेम पलता है वही मनुष्य जीता जागता मनुष्य है। बाकी के अन्दर तो केवल श्वासों का आना जाना है। उसके भीतर और कुछ भी नहीं है। चाहे व्यक्ति हो, चाहे परिवार अथवा समाज हो । सबके अन्तरंग में जब तक प्रेम और वात्सल्य है तब तक जीवन है। जहाँ प्रेम शून्यता होती है, वहाँ संवादहीनता होती है और जहाँ संवादहीनता होती है वहाँ सब कुछ नष्ट-भ्रष्ट हो जाता है। सच है, प्रेमशून्य व्यक्ति के जीवन में संवादहीनता और श्मशान जैसी शून्यता आ जाती है। इसलिये उस घर को जहाँ अनेक लोग रहते हैं, पर एक-दूसरे के प्रति प्रेम का अभाव रखते हैं, उस घर को श्मशान की भाँति कहा है। उदाहरण दिया कि जैसे लुहार धोंकनी को चलाता रहता है। धोंकनी में हवा आती और जाती रहती है। ठीक ऐसे ही लोगों के दिल में धड़कन ज़रूर है पर अन्तरंग प्राण नहीं हैं। वस्तुतः प्रेमशून्य जीवन शव है और प्रेम जुड़ते ही जीवन में शिवत्व की प्रतिष्ठा हो जाती है। शव और शिव में ज्यादा अन्तर नहीं है। एक ईकार मात्र का अन्तर है। ईकार लगा देने मात्र से ही शव से शिव बन जाता है। बस उसी ईकार का नाम है प्रेम का संचरण । हमारे हृदय में प्रेम हो, वात्सल्य हो और एक-दूसरे के प्रति स्नेह हो तो समझ लेना कि हमारे अन्तरंग में धर्म निरन्तर पल्लवित होता जा रहा है। धर्म का लाभ न केवल हम ले रहे हैं, अपितु हमारे सम्पर्क में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति भी उस धर्म रूप तत्त्व से लाभान्वित होने का सौभाग्य अर्जित कर रहे हैं।






