दिव्य विचार: अपने कर्त्तव्यों का निर्वाह सही ढंग से करें- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

दिव्य विचार: अपने कर्त्तव्यों का निर्वाह सही ढंग से करें- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि वस्तुतः जिसका खुद मार्ग स्थिर है वह दूसरों को मार्ग में स्थिर कर सकता हैं, पर जो खुद मार्ग से च्युत हैं, वे दूसरों को कैसे मार्ग में संलग्न करेंगे। लेकिन क्या करें ? आजकल अन्धों को मार्ग अन्धे दिखा रहे हैं। खुद अन्धे हैं, दूसरों को क्या राह दिखायेंगे। हम अपनी आँखें खोले और दूसरों को आगे बढ़ाने की कोशिश करें तब जाकर के हमारा कल्याण हो सकता है। मार्ग हमारे लिये यही सिखाता है और उसकी यही प्रेरणा है, उसी प्रेरणा को लेकर हम चलें। स्थितीकरण अंग हमें हमारे सारे व्यावहारिक कर्तव्यों की बातें सिखाता है। कहीं से किसी भी साधर्मी को किसी भी प्रकार की परेशानी है तो उसे सहारा दो और सहारा देकर उसे आगे बढ़ाने की कोशिश करो। किसी भी व्यक्ति को अगर आप प्यार से सहारा देकर आगे बढ़ाओगे तो गिरते से गिरते हुआ व्यक्ति भी आगे बढ़ सकता है और यदि आपके अन्दर वैसा सद्भाव नहीं है तो आप कभी भी आगे नहीं बढ़ सकते हैं। इसलिये आगे बढ़ें और आगे बढ़ाने की कोशिश करें तो हम जीवन में बहुत बड़ी सफलता अर्जित कर सकते हैं। छोटी-मोटी बातें यदि हमारे जीवन में उतर आती हैं तो वह हमारे जीवन की कामयाबी का आधार बनती हैं। लेकिन हम क्या करें ? हम सिद्धान्तों की तो बड़ी-बड़ी बातें कर लेते हैं पर मूलभूत कर्तव्यों का निर्वाह नहीं कर पाते हैं। यही हमारे जीवन की एक बड़ी चूक है। इस चूक को परिवर्तित करने की आवश्यकता है। हमें यह संकल्प लेना चाहिये कि धर्म के मार्ग में जब हम आगे बढ़ें तो कोई छोटा और बड़ा नहीं है। धर्म का सम्बन्ध आत्मा के गुणों से बाहर की संरचना से नहीं। आज लोग बड़ों को बहुत पूजते हैं, छोटो को तो कोई नहीं पूजता है। सब उगते सूरज को नमस्कार करते हैं। जो पीछे गौण हो रहा है उसके पीछे दृष्टि ही नहीं रखते हैं। उसकी तरफ भी बहुत सारे काम हो सकते हैं। आज हमारी जैन समाज में ऐसी व्यवस्था विकसित होनी चाहिये, जो परेशान पीड़ित और असहाय लोगों की व्यवस्था कर सके।