दिव्य विचार: ऊपर के सौन्दर्य को नहीं देखो- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि शरीर किसी का भी सुन्दर हो ही नहीं सकता है। शरीर में जो भी है वह सब अशुद्ध ही है। अज्ञानी शरीर की सुन्दरता पर आकर्षित होकर मुग्ध हो जाता है। शरीर तो कभी सुन्दर हो ही नहीं सकता है। हमारे शरीर का निर्माण जिन द्रव्यों से हुआ है, उन द्रव्यों का विश्लेषण करके देखें तो पायेंगे कि हमारे शरीर में एक भी ऐसा तत्त्व नहीं है जिसे सुन्दर कहा जा सके। अपितु हमारे शरीर के अन्दर जो मैटेरियल है वह यदि बाहर निकल आये तो सब असुन्दर लगने लगे। फिर आप किस सौन्दर्य की बात करते हैं ? सागर के जल से शुचि कीजे, तो भी शुद्ध न होई। सन्त कहते हैं कि ऊपर के सौन्दर्य को मत देखो। आज जिस रूप के तुम दीवाने बने हो या जिस रूप का तुम अभिमान कर रहे हो, या जिस विद्रूपता से तुम किसी से घृणा कर रहे हो, थोड़ा अगर विचार करो, तो पाओगे कि तुम्हारे तन पर मक्खी के पंख जैसी पतली चमड़ी की परत निकल जाये तो तुम अपने ही शरीर को देखकर घबड़ाने लगोगे। तुम्हें अपने ही शरीर के प्रति ग्लानि होने लगेगी, यह है तुम्हारी असलियत । सब प्रकार के अशुद्ध और अपवित्र पदार्थों के योग से शरीर का निर्माण हुआ है। सन्त कहते हैं- नव द्वार बहे घिनकारी अस देह करे किम यारी। इस शरीर में तो इस प्रकार के तमाम द्रव्य भरे हुये हैं। इसलिये इस शरीर के प्रति ज्यादा अनुराग अथवा इस शरीर की बीभत्सता को देखकर मन में घृणा और ग्लानि का भाव रखना अज्ञानी की पहचान है। ज्ञानी के अन्दर तो ऐसा कुछ होता ही नहीं है। शरीर का स्वभाव तो ऐसा है कि अगर इसे सागर के जल से भी पवित्र किया जाये तो वह अपवित्र ही रहेगा । इसे पवित्र करना संभव नहीं है। अपितु दुनिया की पवित्रतम जितनी भी चीजें हैं वे शरीर के सम्पर्क में आने के बाद अपवित्र हो जाती हैं। सन्त कहते हैं - गंगा के निर्मल जल से नहाने के बाद भी शरीर निर्मल नहीं होता, अपितु इस शरीर के स्पर्श से गंगा का पानी भी अपवित्र हो जाता है। निर्मल जल भी मलिन हो जाता है। यही इसका स्वभाव है।






