दिव्य विचार: अकड़ दिखाओगे तो नष्ट हो जाओगे- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि ऐंठोगे तो नष्ट हो जाओगे और लोगों को अपनाओगे तो तर जाओगे । हमारा यह वात्सल्य एक-दूसरे को अपनाकर, एक-दूसरे के पूरक बनकर जीने की प्रेरणा देता है। उसी दिशा में आगे बढ़ो। तुम्हारा जीवन धन्य हो जायेगा। महानता का आधार यही है। हम अपने हृदय को आसमान की तरह विशाल बनायें। हृदय को आकाश बनायें। सबको उसमें आत्मसात् करने की वृत्ति रखें। यह तभी संभव होगा जब हमारे हृदय का क्षुद्र स्वार्थ नष्ट होगा। हमारे सोच की संकीर्णता नष्ट होगी। वस्तुत: विशाल हृदयी और व्यापक सोच वाले व्यक्ति ही प्रेम के पात्र बनते हैं। वे स्वयं प्रेम में जीते हैं और सारे संसार को प्रेम बाँटते रहते हैं। सन्त कहते हैं कि जीवन का असली मजा इसमें है कि खुद प्रेम से जिओ और लोगों में प्रेम बॉटना शुरू करो। खुद खुश रहो और लोगों को खुश रखने की कला अपनाओ। यदि इस बात को आत्मसात् कर लेते हो तो तुमसे बड़ा भाग्यशाली इस संसार में कोई नहीं होगा। तुम्हारे पास सब कुछ हो लेकिन यदि प्रेम नहीं है तो सब कुछ होने के बाद कुछ भी नहीं है। मेरे सम्पर्क में ऐसे बहुत सारे लोग हैं जो आज करोड़पति हैं, लेकिन एक परिवार में कुल चार ही मेम्बर हैं और चारों मेम्बरों में इतनी ज़्यादा खटपट है कि एक-दूसरे से कोई भी सीधे मुँह बात नहीं करता है। मैं पूछना चाहता हूँ कि ऐसे व्यक्ति की उपलब्धि किस काम की ? जो अन्दर का सुख-चैन खत्म कर दे। यदि किसी व्यक्ति के पास भले ही अभाव है, लेकिन एक-दूसरे के प्रति प्रेम है तभी कोई मतलब है । वस्तुत-बाहर की उपलब्धि अर्थहीन है और भीतर की उपलब्धि ही वास्तविक उपलब्धि है, जो प्रेम और वात्सल्य की भूमिका में प्रकट होती है। यह उपलब्धि किन्हीं भाग्यशाली जीवों के जीवन में ही संभव होती है। इसलिये सन्त कहते हैं कि उस वात्सल्य से अपने आपको जोड़ने की कोशिश करो। एक-दूसरे के प्रति यदि निश्छल प्रेम तुम्हारे हृदय में है तो उसका मजा ही कुछ और होता है, लेकिन हम लोग हैं जो दूसरों से प्रेम पाने की वाँछा तो रखते हैं पर कभी किसी को प्रेम देने की बात नहीं करते हैं।






