दिव्य विचार: मन को रखें स्थिर, विचलित न होने दें- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

दिव्य विचार: मन को रखें स्थिर, विचलित न होने दें- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि जो उन्मार्ग की ओर जाते हुये अपने मन को मोड़कर शिवमार्ग में लगाता है वही सच्चा सम्यग्दृष्टि कहलाता है। हमारा मन स्वभावतः उन्मार्ग की ओर जाने का अभ्यासी है। हमारा मन शुरू से विपथगामी रहा है। उस विपथगामी मन को सत्पथ पर लगाना सच्चे अर्थों में स्वयं का स्थितीकरण है। अपने मार्ग के प्रति हमेशा जागरूक रहें। अपने मन के प्रहरी बनें कि हमारा मन कहीं से विचलित न हो। हमारा मन कहीं इधर-उधर भाग न सके। वह सुपथ में चले, सन्मार्ग में चले जिससे हम अपने जीवन का उद्धार कर सकें और अपने मार्ग को प्रशस्त कर सकें। इसलिये सन्त कहते हैं- पहले अपने मन के प्रहरी बनो। सम्यग्दृष्टि आत्मसाधक जो अपनी आत्मा की साधना की भूमिका में जीते हैं, वे प्रति समय अपने मन के प्रति जागरूक रहते हैं। हमारा मन कहीं से भी इधर-उधर न हो, हमारा मन कहीं से भी डगमगाये नहीं। यदि मन डगमगाता है तो उसे सम्हालने की पूरी की पूरी कोशिश करने वाला साधक ही सच्चे स्थितीकरण अंग से युक्त होता है। इस तरह अपने मन को स्थिर कर चलने का ध्येय रखने वाले साधक आत्मसाधना के क्षेत्र में जब चलता है व्यवहार में भी स्वयं को स्थिर रखता है और यदि किसी कारणवश कोई व्यक्ति मार्ग से च्युत होते दिखता है तो उसे आन्तरिक पीड़ा होती है। उसी पीड़ा से प्रेरित होकर वह उसे सम्हालने में भी सचेष्ट हो जाता है । किसी कारणवश अपने दर्शन, ज्ञान अथवा चारित्र से यदि कोई व्यक्ति मार्ग से स्खलित हो रहा है तो उस गिरते हुये व्यक्ति को सहारा देने का नाम स्थितीकरण अंग है। बन्धुओं, धर्म हमें केवल यही नहीं सिखाता है कि हम अपनी साधना करें और आगे बढ़ें। हमारा धर्म हमें यह भी सिखाता है कि साधना का मार्ग अक्षुण्ण बना रहे और दूसरे साधक भी अपने मार्ग में आगे बढ़ें। अपने कल्याण के साथ- साथ दूसरों के कल्याण की बात सोचना सम्यग्दृष्टि की विशेषता होती है। वह स्वयं के उद्धार के साथ सारे जग के उद्धार की कामना करता है।