दिव्य विचार: जीवन जीने की कला सीखो- मुनिश्री चन्द्रप्रभ जी महाराज
मुनिश्री चन्द्रप्रभ महाराज जी कहते हैं कि जो अपने जीवन को कोयल का संगीत दे सकता है, वह जीवन को आनन्द की फुलवारियों से महका सकता है। वह अपने जीवन को बेसुरे रागों में क्यों उलझायेगा ? मैं जानता हूँ कि अगर आपको जीने की कला मिल जाय तो धरती का नरक बदलने के लिए किसी धर्मराज या यमराज की जरूरत नहीं होगी। मुझे नहीं पता कि किस धर्मराज ने नरक को स्वर्ग बनाया हो या यमराज ने स्वर्ग में जाकर उसे नरक में तब्दील किया हो। लेकिन मैं भलीभाँति जानता हूँ कि जब-जब मनुष्य ने जीवन को जीवन का आयाम दिया तथा जीने की कला अपनाई, तब-तब उसने धरती को, जीवन को, जीवन की व्यवस्थाओं को स्वर्ग जैसा, बदरीवन जैसा आयाम और सौन्दर्य प्रदान किया है। धरती पर दिव्य पुरुषों को भी नरक का सामना करना पड़ा है। पृथ्वी से चले जाने के बाद भले ही उनके प्रयासों तथा कार्यों को अनुकरणीय माना जाय। यहाँ जीसस को सूली पर टांग दिया जाता है, मंसूर के हाथ-पाँव काट दिये जाते हैं, सुकरात को जहर पीना पड़ता है और महावीर के कानों में कीलें ठोंकी जाती है। जिसने अपने जीवन को स्वर्ग बनाने का स्वरूप जान लिया, उसे अगर नरक में भी भेज दिया जाय तो वह उसे भी स्वर्ग में बदलने की कला जानता है। क्या कभी किसी को वैर का सामना नहीं करना पड़ता ? क्या किसी के क्रोध का उसे मुकाबला नहीं करना पड़ता ? क्या किसी की लाठी और शक्ति का सामना नहीं करना पड़ता ? जरूर करना पड़ता है, लेकिन यदि तुम जीने की कला जानते हो तो कोई तुम्हारे सम्मुख अंगारा बनकर आये और तुम सागर हो जाओ तो वह अंगारा निष्प्रभावी हो जाएगा। नरक तुम पर हावी न हो पायेगा। सम्भव है, तुम्हारा स्वर्ग उसे भी कहीं स्वर्ग बना दे। मैं चाहता हूँ, हर व्यक्ति को जीने की कला मिले। वह धार्मिक और आध्यात्मिक बने, उससे पहले उसे जीने की कला आ जाए। जब तक व्यक्ति के मन में निश्चिंतता, शांति और सहजता नहीं हैं, उसके हृदय में सहज प्रसन्नता और प्रमोद भाव नहीं है तब तक वह धार्मिक कैसे हो पाएगा?






