दिव्य विचार: धर्म के बिना समाज नहीं टिक सकता- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

दिव्य विचार: धर्म के बिना समाज नहीं टिक सकता- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि समाज के बिना धर्म और धर्म के बिना समाज नहीं टिक सकता है। धर्म शून्य समाज अराजक बन जाती है, लेकिन समाज के संरक्षण के अभाव में भी कोई धर्म टिक नहीं सकता है। धर्मात्माओं के बिना धर्म टिक ही नहीं सकता है, इसलिये तुम वैयक्तिक स्तर पर जिस धर्म का पालन कर रहे हो, कोशिश करो कि तुम्हारे साथ तुम्हारे आचार-विचार से जुड़े हुये लोग हमेशा फलते-फूलते रहें। किसी के ऊपर किसी भी प्रकार की कोई आपत्ति न आ सके। किसी भी प्रकार की विपत्ति न आने पाये और यदि कोई किसी कारण से अपने मार्ग से च्युत हो रहा है तो उसको सहारा दो। यह तुम्हारी नैतिक जबाबदारी है। लेकिन तब जब हम स्वयं को स्थिर कर सकें/स्थिर रख सकें। आज स्थितीकरण अंग के सन्दर्भ में मैं दो-तीन बातें आपसे कहना चाह रहा हूँ। स्थितीकरण अंग हमारा एक मुख्य अंग है। उपगूहन की पृष्ठभूमि में हम किसी का स्थितीकरण कर रहे हैं। स्वाभाविक है कि मनुष्य दुर्बलाओं का एक प्रकार से पिण्ड है और दुर्बलताओं से स्खलित होकर मार्ग से च्युत हो जाना बहुत कुछ संभव है, लेकिन हमारा धर्म यह नहीं कहता है कि कोई गिर रहा है तो गिरने दो। हमें क्या लेना-देना? जो व्यक्ति यह कहता है कि गिरता है तो गिरने दो तो समझ लो कि अभी उसको धर्म से कुछ भी लेना-देना नहीं है। धर्मात्मा को यदि कोई व्यक्ति गिरता हुआ दिखता है तो उसके मन में इतनी प्रबल पीड़ा होती है कि शायद स्वयं के गिरने से भी उतनी पीड़ा न हो। वह कहता है - नहीं, उसे सम्हालने की यदि हमारे पास क्षमता है तो उसे सम्हालने की कोशिश हमें करना है। हर स्तर पर कोशिश करना है और इसी प्रेरणा से भर कर सम्यग्दृष्टि किसी भी रूप में गिरते हुये व्यक्तियों को सम्हालता है। आज समाज में व्यक्ति कई कारणों से धर्म से च्युत हो जाते हैं। कोई व्यक्ति अपनी पारिवारिक परिस्थितियों के कारण धर्म से च्युत हो जाता है, तो कोई सामाजिक परिस्थितियोंके कारण। कई प्रकार के कारण आते हैं। सन्त कहते हैं- किसी भी कारण से यदि कोई भी व्यक्ति धर्म से स्खलित हो रहा है तो उसे धर्म के मार्ग पर स्थिर करने का प्रयत्न करो।