दिव्य विचार: गुरु की खोज विरलों को होती है- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी ने कहा कि गुरु की खोज विरलों को होती है। आत्मकल्याण की ललक जिसमें होती है वही गुरु को खोजते हैं। कभी मन में विचार आया कि मन में गुरु की ललक जगे, ऐसा कोई मार्गदर्शक मिले कि जीवन यात्रा को मंजिल तक पहुँचा सकूँ।
प्रमाण सागर जी के अनुसार गुरु की खोज हो गयी तो पहचान भी होनी चाहिए। चाहे जिसको गुरु मत बनाओ, पत्थर की नाव पर मत बैठना। कौन है गुरु, पहचानो, आजकल बहुत गुरु घुम रहे हैं, गुरु को चुनना, गुरु घंटाल के चक्कर में मत फँसना। सारे गोरखधन्धे में जो उलझे हो, जिन बातो में तुम उलझे, उसमें गुरु भी उलझे हैं, तो कैसे गुरु। गुरु ऐसे को बनाओ जो तुम्हारा भार हल्का कर दें न कि तुम्हें ही डुबो दें। विषय कषाय से मुक्त हों, स्व-पर के कल्याण और आध्यात्मिक पथ का अनुसरण करें, वही सच्चे गुरु हैं।
गुरु की सेवा भक्ति करना सरल है लेकिन पाना कठिन है। मन से पूछो क्या गुरु को पाया? गर्व से कहते हो, मेरे गुरु तो वो हैं। प्रशंसक हो या अनुयायी। गुरु को पा लिया है, तो क्या गुरु के हुए हो। जब तक मेरे मन की बात है तब तक मेरे गुरुजी मेरे भगवान, मन की बात न हो, तो गुरु को ही समझाने लगते हो।
गुरु के सामने समझ, शक्ति अर्पित करने वाला ही गुरु का होता है। गुरु के होकर के रह गये तो जीवन निहाल, जीवन का अलग रस होगा। मन से पूछो गुरु के पास किस भाव से आते हो- दर्शनार्थी या शरणार्थी। शरणार्थी बनकर आओगे तो संसार बहुत जल्दी सिमट जायेगा, जीवन सफल होगा, विशुद्ध होगा।






