दिव्य विचार: योगमय जीवन ही जीने की कला है- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि संसार का जो सुख है, वह कर्माधीन है, पराधीन है और अन्त से सहित है। ऐसे सांसारिक सुखों के प्रति अनास्था का भाव रखना ही गृहस्थ का निःकांक्षितपना है। चाह से अतीत हो सकते हो तो कोई बात है, पर सांसारिक सुख की चाह अन्दर न हो यह तो हो सकता है। एक सम्यग्दृष्टि धर्मात्मा की यही विशेषता होती है कि वह संसार में जीता ज़रूर है लेकिन स्वयं में रमने की कला प्राप्त कर लेता है। सन्त कहते हैं कि संसार में रहो पर सांसारिकता से दूर रहो। पाप करते हुये भी पाप से अलिप्त रहो। सम्यग्दृष्टि की स्थिति तो कीचड़ में रहने वाले कमल की तरह होती है। सांसारिक सुखों के प्रति अनास्था का भाव, मनुष्य को भोगों में रत रहने के बाद भी योग से जोड़ देता है। बन्धुओं, भोगों में रत रहने के बाद भी योगमय जीवन ही जीवन जीने की कला है, जो सम्यक्त्वी के जीवन में सहज प्रकट हो जाती है। हमारा साध्य भोग नहीं है, हमारा साध्य योग है। हमारा ध्येय भोग नहीं है, हमारा ध्येय योग है और हमारा ध्येय पदार्थ नहीं, परमार्थ है। जिस मनुष्य को उस आत्मसुख की लगन लग जाती है, उसे विषयों के सुख विष के समान दिखने लगते हैं। उसमें रस नहीं आता है, वह यह मानता है कि जो पर के निमित्त से होता है उसमें सही आनन्द नहीं है और जो सहज स्फूर्त होता है, उसमें परम आनन्द है। दो तरह का पानी होता है एक पानी जो आप अपने घर के टैंक में भरकर रखते हैं और दूसरा पानी जो अपने मूल स्रोत से जुड़ा होता है, अपने कुओं में होता है। टैंक में भी पानी है और कुयें में भी पानी है। कुये का पानी अपने मूल स्रोत से निकला हुआ है इसलिये उस कुये का पानी कभी सड़ता नहीं है। लेकिन टैंक का पानी जो बाहर से आरोपित है उसमें कीड़े पड़ जाते हैं। अपने मूलस्रोत से जो प्रकट होता है वह स्वाभाविक होता है। और जो स्वाभाविक होता है वह निर्विकार होता है तथा जो बाहर से आरोपित होता है वह वैभाविक होता है जो वैभाविक होता है, उसमें विकार होता है। सन्त कहते हैं कि सारा सुख पराश्रित है इसलिए वह विकृत है। आत्मा का सुख स्वाभाविक है, इसलिए वह निर्विकार है।






