दिव्य विचार: इच्छाएं ही दुःखो का मूल कारण है- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि सम्यग्दर्शन वह तत्त्व है जो हमें हमारे आत्म वैभव का परिचय कराता है। सम्यग्दर्शन वह दृष्टि है जिससे हम अपने अन्तर्जगत् का दर्शन कर पाते हैं। सम्यक्त्व की ज्योति के प्रकाश में हम अपने भीतर छुपे खजाने का बोध कर पाते हैं। जिससे मनुष्य के अन्तरंग में इस सम्यक्त्व की ज्योति स्फुटित हो जाती है और उसका जीवन धन्य हो उठता है। आज मैं आपसे उसी सम्यक्त्व की चर्चा करने जा रहा हूँ, जो विगत कई दिनों से आप सबके बीच चल रही है। बात सम्यक्त्व के दूसरे अंग निःकांक्षित की है। निःकांक्षित का मतलब है कांक्षातीत हो जाना। कांक्षा का मतलब है चाह और उससे रहित हो जाना निःकांक्षित अंग है। हर मनुष्य के अन्दर इच्छाएँ, आकांक्षायें तो भरी रहती हैं। इन इच्छाओं और आकांक्षाओं को जीत लेने वाला जन न होकर जिन बन जाता है। संसार में केवल भगवान ही ऐसे हैं जिनके मन में कोई इच्छा नहीं है, जिनके मन में कोई आकांक्षा नहीं है। बाकी जितने भी संसार के प्राणी हैं, वे सभी किसी न किसी इच्छा और आकांक्षा से भरे हुये हैं। हर व्यक्ति के मन में कोई न कोई चाह है और जब तक चाह है तब तक दाह है। हमारे जीवन के दुःखों का मूल कारण मन में उत्पन्न होने वाली चाह है। जिस मनुष्य के अन्तरंग में जितनी अधिक चाह होगी उतनी अधिक आकुलता होगी और जितनी अधिक आकुलता होगी उतना अधिक दुःख होगा। चाह से चिन्ता उत्पन्न होती है इसलिये अध्यात्म की साधना का मतलब है, अपने अन्तरंग की तमाम इच्छाओं का अन्त कर देना। इच्छातीत हो जाना, आकांक्षा रहित हो जाना और आत्मा के स्वरूप में लीन हो जाना । जिसके मन में किसी भी प्रकार की आकांक्षा नहीं है, वह निः कांक्षि तपने का धारी सम्यग्दृष्टि है। अगर इस आलोक में हम देखें तो संसार के सामान्य प्राणी सम्यक्त्व से बहिर्भूत दिखाई पड़ेंगे क्योंकि एक भी ऐसा प्राणी नहीं है जिसके अन्तरंग में कोई भी कांक्षा नहीं हो। किसी न किसी प्रकार की इच्छा तो है ही, लेकिन संत कहते हैं कि आत्मा में लीनता के लिये इच्छा बाधक है।






