दिव्य विचार: हमारा पुण्य ही हमारी सुरक्षा- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि बन्धुओ, संसार में जो पदार्थ और चीज़ों को, विषय भोगों के साधनों को अपने लिये शरण और सुरक्षा मानकर चलते हैं वे सब पूतना के आँचल को स्वीकारते हैं। लेकिन सम्यग्दृष्टि धर्मात्मा माँ के आँचल को ही अपने लिये श्रेय मानकर केवल माँ और परमात्मा के अलावा किसी अन्य की शरण नहीं मानता। उन्हें ही स्वीकारता है। जिसके अन्दर यह विवेक होता है वे ही सही और गलत की पहचान कर सकते हैं। इसलिये सम्यग्दृष्टि को कहीं से भी अत्राणभय नहीं होता। वह तो अपने आपको तारणहार मान चुका है। वह कहता है कि अब मेरा उद्धार तो हो ही गया। अब मुझे किसी भी बात को सोचने की ज़रूरत नहीं। वह पार उतर गया और उतर कर ही रहेगा। आखिरी भय है अगुप्तिभय। मेरी कोई सुरक्षा नहीं है। मैं असुरक्षित हूँ। कई लोगों को अपनी सुरक्षा का बड़ा भय रहता है। कदम-कदम पर अपने आपको असुरक्षित महसूस करते हैं। बन्धुओ, सन्त कहते हैं कि संसार में किसकी सुरक्षा की बात करते हो ? तुम जिसकी सुरक्षा की बात सोचते हो उसको कभी सुरक्षित रखा नहीं जा सकता है। और जो तुम्हारा स्वयं है, उसको कहीं से खतरा नहीं है। सम्यग्दृष्टि जानता है कि तन यदि उत्पन्न हुआ है तो नष्ट होगा। तन की सुरक्षा का कोई कितना भी प्रयत्न कर ले, तन कभी भी सुरक्षित नहीं रहता और चेतन को कहीं से कोई असुरक्षा नहीं है। वह तो अजर-अमर है। चेतन जो है, सो है, वहाँ कोई खतरा नहीं। वहाँ कोई समस्या नहीं। लेकिन तन को तो एक दिन मरना ही है। हर किसी को मरना है। कदम-कदम पर सुरक्षा की बात लोग सोचते हैं। कई-कई बार तो ऐसा होता है कि हम संगीनों के माध्यम से अपनी सुरक्षा की बात सोचते हैं, पर संगीनों की छाया में सुरक्षा नहीं होती है। हमारा पुण्य और पाप ही हमारी सुरक्षा और असुरक्षा प्रदान करता है। पुण्य का योग होता है, तो हम सुरक्षित हो जाते हैं, और पाप का योग होता है तो हम असुरक्षित हो जाते हैं। कभी-कभी जब पुण्य की प्रबलता होती है तो जो हमें मारने के इरादे से आता है, वही हमारा तारणहार बन जाता है और पाप की प्रबलता में रक्षक ही भक्षक बन जाता है।






