दिव्य विचार: भगवान के अलावा किसी सहारे की जरूरत नहीं- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि संसार में कौन मेरा तारणहार है? किसके सहारे में इस संसार से पार उतरूंगा? कोई मेरा रक्षक नहीं कोई मेरा सहारा नहीं। अरे भाई, अब किसके सहारे की जरूरत जिसे भगवान का सहारा मिल गया। देव, शास्त्र और गुरु का सहारा मिल गया, अब उसे किसी के सहारे की जरूरत नहीं है। प्रभो ! तेरा सहारा मिल गया अब मुझे किसी और के सहारे की जरूरत नहीं है। तेरे आगे और कोई है ही नहीं। और फिर मैं संसार में किसका सहारा ढूंढू ? किसकी शरण ग्रहण करूँ ? संसार स्वयं बेसहारा है। वह हमें क्या सहारा दे सकता है ? संसार में ऐसा कोई भी नहीं जो हमें सहारा दे सके। हमारा आधार बन सके । संसार का हर व्यक्ति, हर वस्तु अपने आपमें बेसहारा है। जो स्वयं अशरण है वह हमें कैसे शरण दे सकता है ? जो स्वयं अनाथ है, वह हमें नाथ कैसे बना सकता है ? संसार का हर व्यक्ति, संसार की हर वस्तु अपने आपमें अनाथ है। जो स्वयं अनाथ है वह मेरा नाथ कभी नहीं बन सकता। इसलिये वह कल के विषय में सोचता नहीं है। वह स्वयं आपकी शरण में जाता है। वह प्रभु की शरण में जाता है और किसी की शरण की बात वह सोचता ही नहीं है। हम अपने ही स्वयं की बात सोचें और किसी की नहीं। बन्धुओ, संसार में शरण ढूँढना तो ऐसा ही है जैसे किसी जलते हुये बाँस के पेड़ के नीचे जाकर कोई व्यक्ति छाया की कामना करे। उसे हम क्या कहेंगे ? वहाँ छाया नहीं मिलेगी, केवल तपन मिलेगी। संसार में मनुष्य जिस चीज़ को अपनी शरण मानकर चलता है अन्ततः उसे इन्हीं अनुभवों के दौर से गुजरना पड़ता है। वहाँ कुछ भी नहीं मिलता। बन्धुओं, जैसे बच्चे के लिए माँ के आँचल के अलावा दुनिया का कोई भी आँचल अनुकरणीय नहीं है, शरण्य नहीं है, वैसे ही सम्यग्दृष्टि धर्मात्मा के लिये प्रभु के सिवा और किसी की शरण स्वीकार नहीं है।






