दिव्य विचार: प्रलोभनो से मन विचलित न करें- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि आज संक्षेप में उसकी भूमिका बता रहा हूँ और आने वाले दिनों में एक-एक गुण के स्वरूप की चर्चा आपसे करूँगा। सम्यग्दर्शन के आठ अंग शास्त्रों में कहे गये हैं। निःशंकित अंग, निकांक्षित अंग, निर्विचिकित्सा अंग, अमूढदृष्टि अंग, उपगूहन अंग स्थितीकरण अंग, वात्सल्य अंग और प्रभावना अंग। मैं इनकी चर्चा क्रम से करूँगा कि इनकी स्थापना हमारे जीवन में कैसी हो ? सबसे पहले हमारे जीवन में शंका न हो श्रद्धा जमें। विषयों की चाह घटे। फिर हमारे मन से घृणा खत्म हो और गुणों के प्रति अनुराग बढ़े, इसके उपरान्त हमारी जो आस्था है वह अविचल हो, सांसारिक प्रलोभन भरी बातों से हमारा चित्त विचलित न हो, और हम दूसरों के अवगुणों को ढाँकें और गुणों को बतायें। यदि कोई मार्ग से च्युत होता दिखाई पड़ता है तो उसे मार्ग में स्थिर करने की कोशिश करें और धर्मात्माओं के प्रति हमारे दिल में प्रेम हो और धर्म की प्रभावना निरन्तर करें । बन्धुओ, ये आठ अंग हैं। इनकी चर्चा तो मैं आपसे आगे करूँगा पर एक-डेढ मिनट में अपने शरीर के आठ अंगों से जोड़कर आप सबको इन आठ अंगों का बोध कराना चाहता हूँ। यदि शरीर के आठ अंगों की गतिविधियों को आप ध्यान में रख करके चलेगें तो उनमें सम्यग्दर्शन के आठ अंगों की झलक दिखाई पड़ेगी और एक बड़ी प्रबल प्रेरणा भी मिलेगी। शरीर में आठ अंग हैं- दो पैर, दो हाथ, नितम्ब, छाती, पीठ और मस्तिष्क । देखिये जब हम सडक पार करने के लिये बढ़ते हैं तो दाहिने पैर को बिना किसी खटके के आगे बढ़ा देते हैं यानी मार्ग को देख लेना और बिना किसी शंका के बढा देना निःशंकित अंग है। जब हमारा दाया पैर बढ़ता है तो बाया पैर बिना किसी अपेक्षा के उसका अनुकरण कर लेता है। यानी विषयों के प्रति उपेक्षा का भाव हो जाना ही निःकांक्षित अंग है। जब हम अपने बायें हाथ से शरीर की अपवित्रता को दूर करते हैं उस समय हमें ग्लानि नहीं होती हैं।






