दिव्य विचार: पाप से घृणा करो, पापी से नहीं- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि आपके हृदय में जब आन्तरिक प्रेम होगा तो आपके सम्पर्क इसी तरह के बनेंगे। जिस मनुष्य के सम्पर्क इस तरह के बनते हैं उस मनुष्य का जीवन ही कुछ अलग होता है। बन्धुओं, प्रेम की डोर से हम सबको बाँध सकते हैं। जिस व्यक्ति का हृदय प्रेम से भरा होता है, हर कोई उस व्यक्ति के प्रति पागल होता है। उसके प्रेम से प्रेरित होकर के बुरा से बुरा व्यक्ति भी बदल जाता है इसलिये सन्त कहते हैं कि कभी किसी के प्रति घृणा मत करो, प्रेम करो। वात्सल्य अंग का मतलब ही यही है। पण्डित आशाधर जी ने एक बहुत अच्छी बात कही है- नाम का जैनी भी काम का है। आज नहीं, कल सुधरेगा। किसी आदमी को बीमारी होती है तो हम उसके रोग की चिकित्सा करते हैं, न कि रोगी की बीमारी है तो बीमारी को तो हम दूर करते हैं और बीमार व्यक्ति की सेवा करते हैं इसलिये सन्त कहते हैं कि अगर कोई व्यक्ति कितना भी पतित से पतित क्यों न हो, उससे घृणा मत करो। उसके प्रति मन में यदि सद्भाव है तो आज नहीं तो कल उसका सुधार हो जायेगा। आपके घर-परिवार से लेकर समाज में कई तरह के लोग हो सकते हैं जिनके व्यवहार और बर्ताव से आपके मन में असंतुष्टि होगी। साधारणतया हम ऐसे व्यक्तियों से दूरी बढ़ा लेते हैं। पर जिस व्यक्ति का हृदय वात्सल्य के रस से भीगा हुआ होता है वह व्यक्ति को गले से लगाकर सही रास्ते पर ला देता है। हम उसका भी सत्कार करें कि हमने लोगों को ठुकराना शुरू कर दिया है। लोगों के द्वारा कहीं किसी तरह की चूक हुई और हमने उन्हें दूध की मक्खी की तरह निकाल कर एक तरफ कर दिया। वही लोग आज हमसे पूरी तरह से दूर हो गये हैं। यदि प्रेमपूर्ण बर्ताव किया गया होता तो वे लोग आज भी हमारे साथ होते। सन्त कहते हैं यदि कोई किसी कारण से च्युत हो रहा है, तो उसे स्थिर बनाओ। वस्तुतः स्थितीकरण वही कर सकता है, जिसका हृदय प्रेम और वात्सल्य से भरा हो और जो प्रेम और वात्सल्य से रहित होगा वह किसी को भी स्थिर नहीं कर सकता है। वस्तुतः प्रेमशून्य व्यक्ति को खुद के स्थितीकरण की ज़रूरत है, दूसरे की बात क्या करें ?






