दिव्य विचार: आत्मकल्याण के लिए भी तो प्रयास करो- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि दो शब्द हैं- मूढ़ता और मूर्खता। संसार के अधिसंख्य प्राणी मूढ़ हैं। मूढ़ होने का मतलब अज्ञानी होना है। संसार के बहुत से प्राणी अज्ञान की भूमिका में जीते हैं। सम्यग्दृष्टि परम ज्ञान सम्पन्न होता है, इसलिये उसके अन्तरंग में ऐसी कोई बात नहीं होती है जो उसे अज्ञानी की तरह बना सके। वह ज्ञान को प्राप्त हो गया है। जहाँ प्रकाश की किरण प्रस्फुटित हो जाती है, वहाँ अन्धकार नहीं होता है। वैसे ही जहाँ ज्ञान प्रस्फुटित हो जाता है वहाँ अज्ञान कुछ नहीं कर सकता है। वह ज्ञान सम्पन्न होने के कारण तमाम प्रकार की मूढ़ताओं से रहित होता है। संसार में दो प्रकार के लोग हैं-कुछ लोग मूर्ख हैं, कुछ लोग विद्वान् हैं। मूर्खता और मूढ़ता, दोनों अलग-अलग चीजें हैं। मूर्ख व्यक्ति पढ़-लिखकर विद्वान हो सकता है। पर यह कोई जरूरी नहीं कि मूढ़ आदमी ज्ञानी बन जाये। मूढ से ज्ञानी होना अलग बात है और मूर्ख से ज्ञानी होना अलग बात है। हमारे जितने भी विद्या के केन्द्र हैं, वहाँ पढ़-लिखकर आदमी मूर्ख से विद्वान् बन सकता है। लेकिन मूढ़ से ज्ञानी होने का मतलब है अन्तर की प्रज्ञा को उद्घाटित कर लेना। अपने अन्तर और बाह्य स्वरूप को समझ लेना। स्वयं से स्वयं की पहचान कर लेना । दुनिया में बहुत से ऐसे लोग हैं, जो विद्वान तो नहीं हैं, पर मूढ़ हैं और ऐसे भी लोग हैं, जो अविद्वान तो हैं, पर ज्ञानी हैं। नासमझ व्यक्ति भी ज्ञानी हो सकता है और समझदार व्यक्ति भी अज्ञानी हो सकता है। दुनिया में ऐसे बहुत से अँगूठा छाप लोग हुये हैं, जिनके ज्ञान से आज लोगों का पथ-प्रशस्त हो रहा है। जिन्होंने न केवल अपने आत्मज्ञान के बल पर स्वकल्याण किया, बल्कि जगत् के कल्याण का मार्ग भी प्रशस्त कर गये। बहुत सारे ऐसे भी लोग हैं जो कहने को बड़े-बड़े विद्वान के रूप में जाने जाते हैं, लेकिन फिर भी वे स्वयं आत्मज्ञान से शून्य रहे हैं।






