दिव्य विचार: सद्‌गुरू ही सिखाते हैं ज्ञानी बनने का मार्ग- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

दिव्य विचार: सद्‌गुरू ही सिखाते हैं ज्ञानी बनने का मार्ग- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि मूर्खता को दूर करना बहुत सहज है, पर मूढ़ता को दूर करना बहुत कठिन है। तुम्हारे अन्दर की मूर्खता को तुम्हारे ये विद्या केन्द्र दूर कर सकते हैं, पर भीतर की मूर्खता को केवल कोई सद्गुरु ही दूर कर सकता है। मूढ़ से ज्ञानी बनाने का मार्ग केवल सद्गुरु सिखाते हैं। सम्यग्दृष्टि धर्मात्मा उस सद्‌गुरू की कृपा से सही बोध प्राप्त कर लेता है तो उसके अन्दर किसी भी प्रकार की मूढ़ता अवशिष्ट नहीं रहती है। वह उन सबसे मुक्त होकर चलता है। मूढ़बुद्धि कैसी होती है ? दो प्रकार की मूढ़ता हमारे जीवन में आती है - एक आध्यात्मिक मूढ़ता और दूसरी उपासनागत मूढ़ता। सम्यग्दृष्टि आध्यात्मिक मूढ़ता और उपासनागत मूढ़ता, इन दोनों प्रकार की मूढ़ताओं से परे रहता है। आध्यात्मिक मूढ़ता का अर्थ है अपने आत्मस्वरूप से अनभिज्ञ रहना, शरीर में आत्मबुद्धि रखना और शरीर को आदि लेकर के जगत् के सभी पदार्थों में ममत्व का भाव रखना। यह हमारी मूढ़ता है। संसार के सभी प्राणी मूढ़ हैं। वे कहते हैं -शरीर मेरा है, यह सम्पत्ति मेरी है। यह मकान मेरा है, यह दुकान मेरी है। यह स्वत्व और स्वामित्व की जितनी भी चीजें हैं वे सब मेरी हैं। रात-दिन आदमी शरीर में, सम्पत्ति में, सम्बन्धों में, यह कहना शुरू कर देता है कि ये मेरी हैं। सन्त कहते हैं जिनको तुम मेरी-मेरी कहते हो, थोड़ा विचार करो, कि वे तुम्हारे होने को राजी हैं भी या नहीं। वे तुम्हारी हो सकती हैं कि नहीं। आप कहते हो कि ये मकान मेरा है। कभी तुम्हारे मकान ने तुमसे कहा कि मैं तुम्हारा हूँ। जिन चीज़ों को हम अपना कहते हैं, कभी उन्होंने कहा कि वे तुम्हारे हैं? यह सब तुम्हारे हैं भी नहीं, और हो भी नहीं सकते। फिर भी उसे अपना मानना यही तो मूढ़ता है। जो मेरे नहीं हैं, उन्हें अपना मानना मूढ़ता है। पराई सम्पत्ति को अपना घोषित कर देना मूढ़ता नहीं तो और क्या है। किसी व्यक्ति से कहा जाय कि मेरे एक लाख रूपये रखो। मैं थोड़ी देर के बाद ले लूँगा। वह आदमी अपने आपको लखपति मानने लगे तो आप उसको क्या कहेंगे ?