दिव्य विचार: जीवन को आंनद की यात्रा बनाओ- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि ऐसी दृष्टि अपने अन्दर विकसित कर लेने वाले व्यक्ति सांसारिक विषयों में रहने के बाद भी उनमें रचते- पचते नहीं हैं। वे उनसे अनासक्त रहते हैं। ध्यान रखना, अनासक्ति और अलिप्तता यही जैन अध्यात्म की रीढ़ है। अगर कुछ कर रहे तो ऐसा करो जैसे कि नहीं कर रहे हो, करना पड़ रहा है। तब बन्धन से बच पाओगे। एक सम्यक्त्वी की आकुलता इसी से कम होती है। मैंने आपसे कहा था कि आप आकांक्षातीत नहीं रह सकते हैं, लेकिन आकुलता मुक्त ज़रूर रह सकते हैं। आप चाह मुक्त नहीं हो सकते लेकिन हाय-हाय से बच सकते हैं। यह दृष्टि जब तुम्हारे अन्दर विकसित हो जायेगी, तब तुम्हारी आकुलता खत्म हो जायेगी और जब आकुलता और हाय-हाय खत्म हो जायेगी तो तुम्हारी ज़िन्दगी आनन्द की यात्रा बन जायेगी। जीवन को आनन्द की यात्रा बनाओ। सम्यक्त्वमूलक जीवन जीने का मतलब यही है कि अपने जीवन को आनन्द की यात्रा बनायें। आखिर जीवन में किस तरह कामयाबी हासिल की जा सकती है ? यह दृष्टि जिस मनुष्य के अन्दर विकसित होती है तो उसका जीवन धन्य हो जाता है। एक ज्ञानी भी विषयों का आश्रय लेता है और अज्ञानी भी विषयों का आश्रय लेता है, लेकिन दोनों में जमीन-आसमान का अन्तर होता है। अज्ञानी उन्हें ही उपादेय बुद्धि से स्वीकार करके उनमें एकदम लीन हो जाता है और ज्ञानी केवल मज़बूरी में स्वीकारता है। स्वीकारता है लेकिन तटस्थ भाव से। तटस्थता / निष्काम योग पर ही हमारे सम्यक्त्व की पहचान है। सब कुछ करने के बाद भी उससे बिल्कुल अलग होना। देखने में लग रहा है कि आदमी एकदम सामान्य आदमी की तरह जी रहा है, लेकिन उसके भीतर से उसका कोई जुड़ाव नहीं है। आपने देखा किसी आदमी से अगर डण्डे के बल पर काम करवाया जाये और सामने वाले की ताकत देखकर, वह कहे भैया क्या करूँ ? मुझे करना पड़ रहा है, तो वह करते हुए भी नहीं करता है। ऐसा होता है। इसलिये जो सम्यक्त्वी ज्ञानी आत्मा है।






