दिव्य विचार: दृष्टा बने रहो यही तटस्थता है- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि तटस्थ हो जाना इसका मतलब क्या है? आपने देखा कि नदी बहती हो, तो नदी की धार बहती है, तट जहाँ के तहाँ खड़े रहते हैं। संत कहते हैं कि तटस्थ होकर के जिओ। संसार की धार को बहने दो, पर तुम उसके साथ मत बहो। तुम जहाँ हो वहाँ ही रहो। केवल द्रष्टा बने रहो यही तटस्थता है। ऐसी दृष्टि सम्यग्दृष्टि में होती है। अपने अन्तरंग में ऐसी दृष्टि विकसित करने की कला हमें जागृत करने की आवश्यकता है और यदि ऐसी दृष्टि जागृत हो गई तो हमारा जीवन धन्य हो जायेगा। एक ज्ञानी और अज्ञानी में यही अन्तर है। ज्ञानी भी वही काम करता है और अज्ञानी भी वही काम करता है, लेकिन ज्ञानी अपने ज्ञान के प्रताप से बन्धन मुक्त हो जाता है और अज्ञानी अपने अज्ञान के अभिशाप से बन्धन में फँस जाता है। यदि आप कीचड़ में सोने को डालो और दस साल के बाद भी निकालो तो सोना ज्यों का त्यों ही रहेगा। लेकिन यदि उसी कीचड़ में लोहे को डाला जाये तो लोहा जंग खा जायेगा। अज्ञानी लोहे की तरह होता है। जो संसार के कीचड़ में फँस जाता है और कर्मबन्ध की जंग खा जाता है। ज्ञानी सोने की तरह होता है। वह विषयों की कीचड़ में रहने के बाद भी उससे अलिप्त होने के कारण निर्बन्ध रहता है। संत कहते हैं - ज्ञानी बनो, अज्ञानी नहीं। अज्ञानी की तरह तुमने खूब जी लिया, अब ज्ञानी बनने का प्रयत्न करो। वह दृष्टि तुम्हारे भीतर विकसित हो। काम वही, रस अलग-अलग है संसार में दौड़ मची है। काम वही कर रहे हैं। ज्ञानी भी वही कार्य कर रहा है और अज्ञानी भी वही काम कर रहा है, लेकिन एक है जो आनन्द का उपभोग कर रहा है और दूसरा आकुलता से परेशान हो रहा है। आनन्द और आकुलता दोनों हमारी परिणतियाँ हैं। बन्धुओ, संसार में दो प्रकार के प्राणी हैं। एक विषभोजी, दूसरा अमृतभोजी । विषभोजी विष खाकर मरता है और अमृतभोजी अमृत का आस्वादन कर आनन्द लेता है। दोनों की अपनी-अपनी दृष्टियाँ हैं। हम विष का भोजन कर रहे हैं। वह यहाँ अमृत का भोजन कर रहे हैं। धन्य हैं वे ज्ञानी जो अपनी आत्मा के अन्दर का रसपान करते हैं और दुर्भाग्य है उन अज्ञानियों का जो विषयों के विष में ही लीन रह रहे हैं और अपने जीवन को विषत्व मय करते जा रहे हैं।






