दिव्य विचार: धनसम्पदा का जन कल्याण में करें उपयोग- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

दिव्य विचार: धनसम्पदा का जन कल्याण में करें उपयोग- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि इसलिये कोई कमजोर है तो उसे हम कमजोर न मानें अपितु यदि हम बलवान हैं तो अपने बल का संबल देकर कमजोर को भी मजबूत बनायें। हमारा धर्म यही सिखाता है। एक सक्षम आदमी दूसरे अक्षम आदमी को सक्षम बनाने का प्रण ले ले तो समाज का ढाँचा ही बदल जायेगा। लेकिन आज ऐसी प्रवृत्ति लोगों में कम देखने को मिलती है। बन्धुओ, यह हमारा मूलमार्ग है, इसे हमें आत्मसात करके चलने की जरूरत है। यदि कोई व्यक्ति ऐश्वर्य सम्पन्न है तो उसे क्या करना चाहिये ? उन्होंने लिखा कि अपने नातेदारों को एकत्रित कर उन्हें ऊँचा उठाओ। यही ऐश्वर्य का सच्चा लाभ और उपभोग है। यदि शुभसंयोगों के परिणाम स्वरूप तुम्हें कुछ अच्छा मिला है तो तुम्हारे वैभव की सार्थकता इसी में है कि तुम उसका उपयोग उनके कल्याण के लिये करो, जिनके पास उनका अभाव है। यदि उनके लिये आप अपने द्रव्य का उपयोग शुरू कर देते हैं तो यह आपके जीवन की एक विशिष्ट उपलब्धि होगी। पैसा तो हर कोई कमाता है और चला जाता है। इस दुनिया में बहुत से धनपति हुये और उनके द्वारा बहुत ज्यादा धन भी जोड़ा गया लेकिन जोड़ा गया धन यहीं रह गया। यदि उस पैसे को कमा करके हम किसी को सहयोग देते हैं या किसी के जीवन के आधार बनते हैं तो वह पैसा व्यक्ति को पुण्य उत्पन्न करा कर जाता है, जो यश और कल्याण दोनों का प्रदाता होता है। ऐसी दृष्टि हमारी होनी चाहिये । वस्तुतः जो जड़ और चेतन के भेद को जानता है, ऐसा सम्यग्दृष्टि चेतन के सत्कार में सदैव तत्पर रहता है। वह जड़ के पीछे चेतन की कभी उपेक्षा नहीं करता है। वह मानता है कि यह जड़ धन आज मेरे पास है तो केवल संयोग से। आज है, कल रहे न रहे, कोई भरोसा नहीं है। इसलिये इस जड़ धन का उपयोग इस चेतन के उत्थान के लिये करता हूँ तो यह मेरे जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है। केवल इसी मूल भावना से प्रेरित होकर वह बाकी सब बातों को गौण करके चलता है। बन्धुओं, समाज में हर प्रकार के लोग होते हैं। हम जब साधर्मी वात्सल्य की बात करते हैं तो उन लोगों को भी आगे बढ़ाने की कोशिश करना चाहिये, जो अभी निचली पायदान में खड़े हैं।