दिव्य विचार: धनी होने पर कितने सुखी हुए हम- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि तुम जिन आधारों को अपने सुख का साधन मानकर चल रहे हो, जिनको अपने सुख का आलम्बन मानकर चल रहे हो वे आखिर तुम्हारे जीवन को कितना सुखी बना रहे हैं? यह धारणा अपने जीवन में दृढ़ बनाने की ज़रूरत है। धन-सम्पन्नता हमें खूब मिली, और उसको भी टटोलकर देखा कि इतना धनी बन जाने के बाद मैं कितना सुखी हुआ । अपने जीवन की शुरूआत् की ओर देखो कि मैं अपने जीवन में जब अपेक्षाकृत कम धनी था और इस विश्वास से आगे बढ़ा था कि यदि धन-पैसा कमाऊँगा तो मैं सुखी हो जाऊँगा, उस समय मेरा धनाभाव ही मेरे दुःख का कारण था, इसलिये मैने धन-पैसा कमाना शुरू किया। आप अपना थर्मामीटर अपने पास रखना, दूसरों की ओर झाँककर नहीं देखना । देखो कि जब मैंने धन कमाना शुरू किया था तब मेरे जीवन में कितने दुःख थे और आज जब मैं अपेक्षाकृत धनी बन गया तो मेरे जीवन में कितने दुःख हैं ? हिसाब लगा लेना और ईमानदारी से समीक्षा कर लेना कि जिस समय धन कम था तो उस समय दुःख और दुःख के कारण कम थे, और जब धन ज़्यादा बढ़ गया है तो दुःख और दुःख के कारण बढ़ गये हैं और यही तुम्हारे विश्वास को तोड़ने का आधार बनेगा। धन-पैसा के पीछे मैं ज़िन्दगी भर पागल होता रहा लेकिन यह सुख का आधार नहीं है, इस विश्वास को अपने अन्तर्मन में जगाओ, यही सम्यग्दर्शन है। सम्यग्दर्शन की केवल परिभाषा रटना नहीं है, बल्कि उसे जीवन व्यवहार में उतारने की ज़रूरत है। उसे उतारिये। सबसे पहले श्रद्धा में जमा लो कि पैसा मेरे सुख का आधार नहीं है, मेरे कहने से नहीं बल्कि पूर्ण परीक्षण करके। दुनिया में बहुत ज़्यादा धनपति हैं जो तरह-तरह के हथकंडे अपना करके पैसा कमाते हैं, लेकिन उनकी अन्तरात्मा से पूछो कि पाप में प्रवृत्त होकर पैसा कमाने से उनके अन्दर का सुख-चैन खत्म हो जाता है या नहीं ? वस्तुतः जैसे रेते को निचोड़ने से तेल नहीं निकलता है, वैसे ही संसार की चीज़ों से सुख का रस कभी निकल ही नहीं सकता है। चाहे आप कितना भी प्रयत्न और पुरुषार्थ क्यों न कर लो।






