दिव्य विचार: अपने स्वभाव को बदलने का संकल्प लें- मुनिश्री चन्द्रप्रभ जी महाराज

दिव्य विचार: अपने स्वभाव को बदलने का संकल्प लें- मुनिश्री चन्द्रप्रभ जी महाराज

मुनिश्री चन्द्रप्रभ महाराज जी कहते हैं कि आम जनमानस की एक चर्चित मान्यता है कि जिसका जो स्वभाव पड़ जाता है, शमशान में पहुँचकर ही छूटता है। मैं इसी संदर्भ में अनुरोध करूँगा कि मनुष्य-स्वभाव जैसी कोई तय वस्तु दुनिया में नहीं है। आदमी जैसा अपनी ओर से बनना चाहता है, वैसा वह बन जाया करता है। स्वभाव का अर्थ है किसी भी कार्य को निरन्तर करते रहने पर मनुष्य के चित्त पर जो संस्कार हावी हो जाता है, उसी का नाम स्वभाव है। प्रकृति ने मनुष्य को कोई तय स्वभाव प्रदान नहीं किया है। वह जैसा बनना चाहता है उसे वैसा ही बनने की पूरी आजादी दी हुई है। पशुओं का स्वभाव अवश्य तय होता है, पर मनुष्य का नहीं। दुनिया के किसी एक कुत्ते का स्वभाव अगर भौंकना है तो दुनिया के सारे कुत्ते एक ही स्वभाव को लेकर पैदा होते हैं। बिल्ली का स्वभाव अपने आप में तय है, गाय का स्वभाव भी तय है सांड का स्वभाव भी तय है, पर मनुष्य का स्वभाव तय नहीं है। सौ तरह के मनुष्य होते हैं और सभी का स्वभाव अलग-अलग हुआ करता है। दुनिया का हर मनुष्य अपने आप में अद्वितीय है। किसी की तुलना अन्य के साथ नहीं की जा सकती। सब अपने-अपने स्वभाव को लिए हुए हैं। अगर हम यह मान लेंगे कि मनुष्य का स्वभाव तय है तो जो मनुष्य क्रोध करता है वह मनुष्य जिन्दगी भर क्रोध ही करता रहेगा, पर ऐसा नहीं होता, जैसे ही किसी ने गाली दी और उधर क्रोध पैदा हुआ। जैसे इधर किसी ने बटन दबाया, उधर बल्ब जला। मनुष्य का ऐसा कोई तय स्वभाव नहीं होता है। अगर व्यक्ति अपने स्वभाव को बदलने का संकल्प ग्रहण कर ले तो दुनिया में ऐसी कौन-सी कठिन वस्तु है जिसे मनुष्य करना चाहे और न कर पाए ? हमारे युग की महानतम खोजों में एक यह भी है कि हम अपने स्वभाव, संस्कार और सोच में परिवर्तन ला सकते हैं। इन्हें बदला जा सकता है। कोई व्यक्ति अपने आप में बुरा है तो इसलिए क्योंकि उसने कभी अच्छा होने का संकल्प ही नहीं लिया। कोई व्यसन कर रहा है तो उसने व्यसनों से छूटने के लिए मनोबल के साथ आत्म-संकल्प न लिया होगा।