दिव्य विचार: जिसकी आंखे खुली, वही बाहर निकलेगा- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज कहते हैं कि एक आदमी एक ऐसे कक्ष में प्रविष्ट हो गया जिससे कि बाहर निकलने का केवल एक ही द्वार था । अन्दर सघन अंधेरा था और उस पर वह आदमी अन्धा भी था। बड़ी मुश्किल थी उसके साथ। वह द्वार को टटोलता टटोलता बाहर आना चाह रहा था, लेकिन एक बड़ा विचित्र संयोग होता है कि जब कभी वह दरवाजे के समीप पहुँचता तभी उसके सिर पर खुजाल आती और उस खुजाल भरी स्थिति में वह उस दरवाजे को क्रॉस कर जाता। वह बार-बार चक्कर काट रहा है लेकिन दरवाजा उसे नहीं मिल रहा है। दीवाल को टटोल रहा है लेकिन द्वार तक पहुँच नहीं पा रहा है। बन्धुओ ! यह कहानी किसी गैर की नहीं हमारी और आपकी कहानी है। हम जिस संसार में रह रहे हैं वह किसी अन्ध कक्ष की तरह है और इस अन्ध कक्ष के द्वार से केवल वही बाहर निकल सकता है जिसकी आँखें खुली हुई हों। जिसकी आँखें बन्द हैं, जिसकी आँखें फूटी हुई हैं, वह कभी भी बाहर नहीं निकल सकता है। इस संसार रूपी कक्ष से बाहर निकलने का एक ही द्वार है जो धर्म का द्वार है और धर्म के द्वार में प्रवेश केवल उनको मिलता है या धर्म के द्वार तक केवल वे पहुँच पाते हैं जिनके पास श्रद्धा की आँख होती है। वह आँख हमारे भीतर होनी चाहिए। हम आज तक जो भी कर रहे हैं वह एक अन्धे के द्वारा दीवाल को टटोलने जैसा कृत्य है । अन्धा लाख कोशिश करे लेकिन द्वार तक पहुँचने के बाद खाज खुजलाने की आदत उसकी यदि बनी रहेगी तो कभी वह द्वार का लाभ नहीं ले पायेगा। हम सब कई-कई बार द्वार तक तो पहुँचे हैं लेकिन द्वार तक पहुँचने के बाद भी बाहर निकलने का सौभाग्य प्राप्त नहीं कर पाये क्योंकि आँखें फूटी हुई है। कभी चिराग नहीं जला, तो कभी आँखें फूटी रहीं। यह हमारे जीवन का सबसे बड़ा दुःसंयोग है और उस दुःसंयोग को दूर करना ही हमारा सबसे प्रबल पुरुषार्थ है। यही हमारे जीवन का लक्ष्य होना चाहिये और यही हमारे जीवन की उपलब्धि बननी चाहिये। जब तक हम अपना ठोस लक्ष्य प्राप्त नहीं करते हैं तब तक यथार्थ उपलब्धि तक पहुँचना भी असंभव है।






