दिव्य विचार: सकारात्मक सोच से मिलती है सफलता- मुनिश्री चन्द्रप्रभ जी महाराज
मुनिश्री चन्द्रप्रभ जी महाराज कहते हैं कि स्वस्थ, प्रसन्न और मधुर जीवन जीने का पहला और आखिरी मंत्र है। सकारात्मक सोच ! यह वह दिव्य मंत्र है जो आपकी व्यक्तिगत और पारिवारिक, सामाजिक और राष्ट्रीय तथा समस्त विश्व की समस्याओं को सुलझा सकता है। मानसिक शांति और तनावमुक्ति के लिए सकारात्मक सोच सबसे बेहतरीन कीमिया दवा है। यह सर्वकल्याणकारी महामंत्र है। मैंने इस मंत्र का अनगिनत लोगों पर प्रयोग किया है और चमत्कारी परिणाम प्राप्त किए हैं। यह मंत्र आज तक निष्फल नहीं हुआ है। जीवन में जिन्होंने सफलता के कीर्तिमान स्थापित किए हैं, उनका प्रमुख कारक तत्त्व सकारात्मक सोच ही रहा है। जीवन में निष्फलता/असफलता का कारण भी सकारात्मक सोच का अभाव ही रहा है। मेरी शांति, संतुष्टि और प्रगति का प्रथम पहलू सकारात्मक सोच ही है। सकारात्मक सोच, धरती पर रहने वाले हर इन्सान का पहला धर्म हो और यही उसके जीवन की आराधना का बीजमंत्र भी। सकारात्मक सोच का स्वामी सदा धार्मिक ही होता है। जीवन में उपस्थित विपरीत वातावरण में भी जो अपने चित्त को अपने जीवन के अनुकूल बना सकता है, स्वयं पर नियंत्रण रखता है और विपरीत धाराओं के बावजूद सार्थक व्यवहार करता है, वही धार्मिक है। सकारात्मक सोच जीवन का पुण्य पथ है और नकारात्मक सोच ही पाप का मार्ग है। सकारात्मक सोच ही धर्म है और नकारात्मक सोच ही विधर्म है। सकारात्मक सोच यानी स्वर्ग दिखाने वाली प्रकाश-रेखा और नकारात्मक सोच यानी नरक की गहरी खाई में उतारने वाली फिसलन-पट्टी। सकारात्मक सोच में जीना स्वर्ग-पथ पर अनुसरण करने के समान है और नकारात्मक पथ का अनुगमन करना खुद को पाप की, नरक की घाटी में धकेलना है। जब धरती पर ऐसा दिव्य मंत्र आविष्कृत हो चुका है तो मनुष्य अपने जीवन में अवसाद, तनाव, घुटन या अन्य मानसिक त्रासदियों से क्यों गुजरे? जिसने जीवन में सकारात्मक सोच के चिराग को थाम लिया है या इस सोच को जीवन का संबल और मील का पत्थर बना लिया है।






