दिव्य विचार: बुरा सोचने वाले शैतान को बाहर निकालो- मुनिश्री चन्द्रप्रभ जी महाराज
मुनिश्री चन्द्रप्रभ महाराज जी कहते हैं कि गांधीजी ने कभी कहा था. बुरा मत सुनो, बुरा मत देखो, बुरा मत बोलो। सम्पूर्ण विश्व में प्रतीक रूप में गांधी जी के तीन बंदर ये संदेश पहुँचाते हैं। मैं भी तीन बंदरों को प्रतीकात्मक रूप में धर्म और अध्यात्म के संदेश के लिए स्थापित करना चाहता हूँ। लेकिन इन तीन बंदरों के साथ एक बंदर और जोड़ना चाहूँगा। इसे इन तीनों से पहले भी रखूँगा जिसकी एक अंगुली दिमाग पर हो। बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो, बुरा मत बोलो लेकिन उससे भी पहले बुरा मत सोचो। अगर तुम बुरा नहीं सोचोगे तो बुरा नहीं बोल पाओगे। जब बुरा सोचने वाला उपस्थित है तो तुम रस ले-लेकर बुरा सुनोगे। आज तुम्हारे 'अंदर भगवान का 'वासा' नहीं है। भगवान उस दिन तुम्हारे भीतर आएँगे जिस दिन तुम अपने भीतर बैठे हुए बुरा सोचने वाले शैतान को बाहर निकाल दोगे। तब तुम कह सकोगे, 'घट-घट में भगवान है।'... अभी तो शैतान ही विराजित है। जब सोच विपरीत होती है तो परिणाम भी उल्टे आयेंगे। मस्तिष्क में जैसा डालोगे, यह वापस वही देगा। आपके जीवन में आपकी सोच-विचार-शैली-शब्द गलत परिणाम दे रहे हैं तोअच्छे परिणामों के लिए अच्छे बीज बोइए। यह प्रकृति ध्वनि और प्रतिध्वनि के सिद्धान्त पर आधारित है। जैसा बिम्ब होगा, वैसा ही प्रतिबिम्ब बनेगा। प्रकृति की व्यवस्था तो ऐसी है कि वह एक वस्तु को कई गुना करके वापस लौटाती है। एक बीज के बदले लाखों फल वापस लौटते हैं। आपके एक क्रोध की प्रतिक्रिया भी कई गुना होकर वापस क्रोध के रूप में आती है। अगर आप एक मधुर गीत गाते हैं या मुस्कान का एक फूल बिखेरते हैं तो वह दस गुना होकर ही लौटेगा। स्वयं के द्वारा सद्व्यवहार करना दूसरों की ओर से सद्व्यवहार पाने का अमृत मार्ग है। किसने आपके साथ क्या किया, यह कोई मायने नहीं रखता। आप अपनी ओर से कैसा व्यवहार और सलूक करते हैं, यह मूल्यवान है। कोई आप पर अँगुली न उठा सके, इस बात का ख्याल रखें। अपनी ओर से इतना शालीन व्यवहार करें कि आपके अधीनस्थ, आपके समकक्ष, आपका परिवार, मित्र और अन्य सभी आप पर गर्व कर सकें।






