दिव्य विचार: धर्म के प्रति अन्तर्मन से समर्पित रहें- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

दिव्य विचार: धर्म के प्रति अन्तर्मन से समर्पित रहें- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि पहली बात तो अपने दिल-दिमाग में अच्छी तरह से स्थापित कर लीजिये। हम अपने देव, गुरु और धर्म के प्रति अन्तर्मन से समर्पित रहें। हमारे मन में उनके प्रति, उनके स्वरूप के प्रति किसी भी प्रकार की शंका न हो। हमारे मन में श्रद्धा होगी तो हमारा उद्धार सुनिश्चित है। अपने भीतर के मिथ्यात्व के तमस को दूर करने के लिये हमारे पास इसके अलावा कोई दूसरा रास्ता ही नहीं है। जब तक सच्चे देव, शास्त्र और गुरु के प्रति आन्तरिक श्रद्धा उत्पन्न नहीं होती तब तक मिथ्यात्व नष्ट नहीं हो सकता है। हमारे सम्यक्त्व का मार्ग प्रशस्त नहीं हो सकता है। जिस मनुष्य के अन्तर्मन में ऐसी श्रद्धा उत्पन्न होती है उसकी शंका दूर होती ही है। उसका भय भी नष्ट हो जाता है। जो सम्यग्दृष्टि होता है वह निःशंक होता है और जो निःशंक होता है वह निर्भय होता है। वह सात भयों से मुक्त होने के कारण निःशंक होता है। अब कोई शंका नहीं, कोई भय नहीं। जहाँ शंका है वहाँ निश्चितता नहीं है और जहाँ निश्चितता है वहाँ शंका नहीं है। वस्तुतः निःशंका में निश्चितता और शंका में सदैव चिन्ता है, भय है, उद्वेग है, आवेग है। सम्यग्दृष्टि धर्मात्मा जीव भय, चिन्ता और उद्वेग जैसी नकारात्मक जितनी भी दुर्बलतायें हैं, नकारात्मक चिन्तवन है, आवेग है, उनसे मुक्त होता है। जीवन जीने की कला को वह जानता है। वह सबके बीच रहता है लेकिन वह अलग ढंग से रहता है। छोटी-मोटी बातें उसे प्रभावित नहीं कर पातीं। तमाम प्रकार की दुर्बलताओं से मुक्त होकर आनन्दमय जीवन जीता है। उसका चित्त कभी विचलित नहीं होता है। कदाचित् उसके मन में भय उत्पन्न भले ही हो जाये लेकिन भयजन्य व्याकुलता नहीं होती है। भय होना अलग बात है और भयातुर होना दूसरी । भयोत्पादक परिस्थिति के निर्मित होने के कारण उसके प्रति सजगता और सावधानी रखना अलग बात है लेकिन उसकी चिन्ता में रात-दिन मग्न हो जाना अलग बात है। सम्यग्दृष्टि सात प्रकार के भयों से मुक्त होता है। हमें अपने आपको इन भयों से मुक्त करने की कोशिश करनी चाहिये।