दिव्य विचार: शंका है तो उसे निर्मूल करें- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि अपने मन का विश्लेषण करके देखो। कहीं कोई शंका तो शेष नहीं है। यदि शंका है तो उसे निर्मूल करने का प्रयत्न करें। उसे दूर करें। निश्चित रूप से आपके जीवन में एक उपलब्धि घटित होगी। और जब तक तनिक भी शंका शेष होगी काम नहीं बनेगा। जहाँ शंका है वहाँ अनेक प्रकार की दुर्बलतायें हैं, भय हैं। आपके मन में एक बार दृढ़ विश्वास बन जाये, सारी समस्यायें अपने आप ही दूर हो जायेंगी। फिर हमें ज़्यादा उपदेश की कतई आवश्यकता नहीं होगी। अपने अहं को गौण करके श्रद्धा को उद्घाटित करने का प्रयास करें। पर मैंने जैसा बताया कि अहं आड़े आता है, जो हमें कुछ भी स्वीकार नहीं करने देता है। हमारे अन्तर्मन को विचलित कर डालता है। हम अहं को दूर करें। हमारे अन्दर श्रद्धा का अजस्र स्रोत है, लेकिन उसके ऊपर चट्टान पड़ी हुई है। जैसे कहीं चट्टान हो और नीचे निर्मल जलस्रोत हो लेकिन जब चटटान है तब तक नीचे का स्रोत प्रकट नहीं हो सकता। उस स्रोत को प्रकट करना चाहते हो तो चट्टान पर घन का प्रहार करना आवश्यक है। आप चट्टान पर जब निरन्तर घन का प्रहार करोगे तो चट्टान फूटेगी और भीतर का स्रोत प्रकट हो जायेगा। सन्त कहते हैं कि तुम्हारे अन्दर श्रद्धा का अजस्रस्रोत है पर उसमें सम्यक्पुरुषार्थ के घन के प्रहार की ज़रूरत है। एक बार घन का प्रहार करोगे तो वह अहं की चट्टान टूटेगी, निर्मल स्रोत प्रकट होगा और निर्मल प्रवाह से हमारी आत्मा निर्मल होगी । उस निर्मल स्रोत के लिये हमें निरन्तर सक्रिय और सचेष्ट रहने की आवश्यकता है। उसके लिये आगे बढ़े। मैंने कहा कि श्रद्धा से अहं नष्ट होता है और अहं के कारण श्रद्धा प्रभावित होती है, दोनों एक-दूसरे से जुड़ी हैं। श्रद्धा प्रकट हो तो अहं नष्ट हो, नष्ट हो तो श्रद्धा प्रकट हो। यह तो ऐसे हो गया कि ताला खुले तो चाबी मिले, और चाबी मिले तो ताला खुले । क्या करें ? कैसे खोलें ताला ? चाबी भीतर है। दोनों चीजें एक साथ कैसे हों ? घबराने की ज़रूरत नहीं है। सन्त कहते हैं कि जिस ताले को खोलने का तुम्हें इशारा किया जा रहा है, उस ताले को केवल चाबी से ही नहीं खोला जाता है, वह तो नम्बर मिलाकर भी खोला जाता है।






