दिव्य विचार: अच्छाई की तरफ ज्यादा ध्यान दें- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

दिव्य विचार: अच्छाई की तरफ ज्यादा ध्यान दें- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि हमें अपना छोटा-सा गुण दिखाई पड़ता है और सामने वाले का छोटा-सा दोष भी दिखने लगता है। वस्तुतः यह हमारी एक प्रवृत्ति बन गई है, दोषदर्शन की । स्वभावतः हम बुराई देखने के आदी हो गये हैं। अच्छाई की तरफ हमारा ध्यान कम जा पाता है। बुराई के प्रति हमारा चित्त सहजता से आकृष्ट हो जाता है और जब तक हमारा चित्त बुराई के प्रति आकर्षित होता रहेगा तब तक हम अपने आपको बुराई से बचा नहीं सकेंगे। बन्धुओ, बुराइयों के प्रति आकृष्ट होना ही हमारे जीवन की सबसे बड़ी बुराई है। जब तक यह बुराई हमारे अन्दर रहेगी तब तक हम अपने जीवन में अच्छाइयों के फूल नहीं खिला सकते हैं। इसलिए अच्छाईयों को अपनाना चाहते हो तो जहां तक बने दूसरों के दोषों को देखो मत और यदि देखने में आ भी जायें तो उसे प्रचारित न होने दो।

दोषवादे च मीनम्।

यदि किसी की दोषपूर्ण बात तुम्हारे सामने आ भी जाये तो उस बात को तुम वहीं दबा दो, उसके बारे में बोलो मत, दोषों के ख्यापन से आखिर तुम्हें हासिल क्या होगा? मिलना कुछ भी नहीं हैं। हॉ, दूसरों में दूषण लगाकर तुम अपने जीवन को दूषित जरूर कर सकते हो। संत कहते हैं कि कभी दूसरों पर दूषण मत लगाओ। कोशिश करो दोष दिखे ही नहीं और यदि दिख भी जाये तो उसे अंदर पचाने की कोशिश करो। पर बड़ी मुश्किल होती है अपने अंदर किसी की गलती को पचा पाना। ज्ञानी आदमी का हाजमा बहुत मजबूत होता हैं। ज्ञानी आदमी बड़ी से बड़ी बात को भी हजम कर लेता है। उसकी सोच बहुत गहरी होती है। लेकिन जो अज्ञानी है और उथली सोच का धनी है उसका हाजमा बहुत कमजोर होता है। उसके पेट में कुछ पचता ही नहीं है। साधारण सी बात को भी वह इस तरह से प्रस्तुत करता है कि सामने वाला हतप्रभ रह जाये। बंधुओ, यह बहुत बड़ी कमजोरी है। जो दूसरों के दोषों को दबाये वह उपगूहक है और जो दूसरो के दोषों को बताये वह उपगूहक नहीं उ‌द्घोषक है। उद्घोषक मत बनिये, उपगूहक बनिये।