दिव्य विचार: जैन दर्शन में व्यक्ति पूजा का स्थान नहीं- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

दिव्य विचार: जैन दर्शन में व्यक्ति पूजा का स्थान नहीं- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि जब हम लोग आत्मा-आत्मा की बातें अज्ञानियों के बीच करते हैं तो लोग कहते हैं -महाराज आप भी कहाँ हाथ धोकर पीछे पड़ गये। अरे महाराज, आप क्या जानें ? आपने तो दुनिया देखी ही नहीं। बन्धुओं, यही अज्ञान है। अन्धों को अगर उपदेश दिया जायेगा तो यही हाल होगा। इसलिये हम अन्धों को उपदेश नहीं देते, आँखें देना चाहते हैं। यदि अन्धों को आँख प्रकट हो जाये तो वे पूरी की पूरी हरीतिमा का आनन्द स्वयं ही ले सकते हैं। 

आध्यात्मिक मूढ़ता - बन्धुओ, वह आँख हमें स्वयं प्रकट करनी होगी। जिस दिन यह दृष्टि हमारे भीतर प्रकट हो जायेगी, फिर तुम्हें उपदेश की ज्यादा आवश्यकता नहीं पड़ेगी। जब तक तुम इस दृष्टि से सम्पन्न नहीं होते हो तब तक तुम्हें कितना भी उपदेश सुनाया जाए तुम्हें असर नहीं होगा। उस दृष्टि को प्राप्त करने का नाम ही अमूढ़ दृष्टित्व को प्राप्त करना है। यह तो आध्यात्मिक मूढ़ता की बात हुई। उसको दूर कीजिये। अपने अन्तरंग में यह बात स्थापित कीजिये कि इन सबके बीच में मैं हूँ ज़रूर, पर मेरी स्वतन्त्र सत्ता है। मैं सबसे भिन्न हूँ, अलग हूँ, अकेला हूँ और अनोखा हूँ। उनसे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है। उनसे मेरा कोई सम्पर्क नहीं है। मैं तो मैं, दुनिया के और जितने भी लोग हैं वे भी वे हैं। ये सब मेरे नहीं और मैं उनका नहीं हूँ। यह दृढ़ धारणा सम्यग्दृष्टि की बन जाती है। इसी कारण वह सबके बीच रहकर केवल स्वयं में रमने की क्षमता अर्जित कर लेता है। यही जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है। 

उपासनागत मूढ़ता - दूसरे प्रकार की मूढ़ता है उपासनागत मूढ़ता। पूजा, उपासना, आराधना सम्यक्त्वी का एक गुण है। पूज्य पुरुषों की आराधना से हमारे गुणों का विकास होता है। पूज्य की उपासना से हमारे अन्दर पूज्यता आती है। हमारी उपासना और पूजा का मूल मकसद यही है। हम कहते हैं कि वन्दे तदुणलब्धये । हे भगवन, चरणों में मैं प्रणाम अर्पित कर रहा हूँ, क्योंकि आपको प्रणाम कर मैं आपके गुणों को प्राप्त करना चाहता हूँ। जैनदर्शन में व्यक्ति की पूजा को स्थान नहीं है। गुणों की पूजा को स्थान दिया गया है।