दिव्य विचार: सभी से मित्रता का भाव रखिए- मुनिश्री चन्द्रप्रभ जी महाराज
मुनिश्री चन्द्रप्रभ महाराज जी कहते हैं कि आप सबसे प्रेम-मैत्री रखिए। मैं सबका मित्र हूँ। विश्वमित्र हूँ। सारा विश्व मेरा मित्र है। मुझे नहीं लगता कि धरती पर हमारा कोई दुश्मन होगा। अगर हमें पता चल जाए कि कोई व्यक्ति हमारा दुश्मन है तो हम अवश्यमेव वहाँ जाते हैं और उसका दिल जीतने की कोशिश करते हैं। हम जायेंगे और उसके आगे अपने आपको इतना विनम्र और मधुर कर देंगे कि उसका दिल पिघल ही जाएगा। अपने पर आँच आई और हम पिघल पड़े तो क्या पिघले ? हम ऐसे पिघलें कि किसी और पर आँच आए तो वह भी पिघल जाए। हमारी जिन्दगी में कोई शत्रु बन गया, चिन्ता नहीं, हमारा पुरुषार्थ उसे मित्र बनाने का जरूर होना चाहिए। हम बहुत ही विनम्रता से, शालीनता से, मधुरता से पेश आएँ। सीमित शब्दों में अपनी बात कहें। ज्यादा जरूरत नहीं है माथाकूट करने की। हम सुबह सूर्योदय से पहले जगें। जब भी जगें, अपने हृदय में उत्साह, उमंग और आत्म-विश्वास का संचार करें। सुबह उठकर अपने माता-पिता को पंचांग प्रणाम करें। इससे उनकी दुआएँ मिलेंगी। यही हमारी विनम्रता भी होगी। माँ-बाप को और तो कुछ नहीं चाहिए, केवल हमारी विनम्रता चाहिए। उनके हाथ अपने सिर पर आने दें। हम अपने घर के अन्य सदस्यों का भी दिल से अभिवादन करें और इस तरह से सुबह-सुबह ही घर के वातावरण को सौम्य बना डालें। जैसे कोई आदमी बगीचे में जाकर प्रफुल्लित होता है वैसे ही हमें ऐसा लगेगा जैसे हमारा घर ऐसा ही कोई उद्यान हो चुका है जिसका हर सदस्य गुलाब का, जूही का, चम्पा का और चमेली का फूल है। जब हम भोजन करने के लिए बैठें तो ध्यान रखें कि एक गिलास पानी और तौलिया अपने पास रखकर बैठें। जब भी भोजन करें, पहले अपने हाथों को धो लें, फिर भोजन शुरू करें। ध्यान रखें, जब भी भोजन करें, पहले देखें कि हमारे नाखून अगर बढ़े हुए हैं तो हम भोजन करने की जल्दी न करें।






