दिव्य विचार:संकल्प से स्वभाव बदल जाता है- मुनिश्री चन्द्रप्रभ जी महाराज

दिव्य विचार:संकल्प से स्वभाव बदल जाता है- मुनिश्री चन्द्रप्रभ जी महाराज

मुनिश्री चन्द्रप्रभ महाराज जी कहते हैं कि आदमी संकल्प करे और अपने स्वभाव तथा आदतों को न बदल सके, यह असंभव नहीं है। जब मिट्टी में से फूल खिलाया जा सकता है और गमले में भी पौधे को पैदा किया जा सकता है तो सोचो कि पौधे में हम जो खाद देते हैं, उस खाद में कितनी दुर्गन्ध होती है लेकिन इसके बावजूद अगर उसे रूपांतरण की कमियों मिल जाती है तो वही दुर्गन्धित खाद किसी भी पौधे में खिले हुए फूल की सुवास का कारण बन जाती है। जब गन्दगी सुगंध में परिणत हो सकती है और माटी किसी को जन्म देने का कारण बन सकती है तो आदमी संकल्प कर ले तो क्या वह अपने जीवन में किसी भी तरह का रूपांतरण घटित नहीं कर सकता ? जो व्यक्ति संकल्पशील नहीं होते हैं, वे ही अपने जीवन में गलत राहों पर चलते हैं। वे चलते रहते हैं और मर भी जाते हैं तब भी वे उन गलत राहों से छूट नहीं पाते। 

'ज्यां' का जैसा स्वभाव, जासी जीव सूं। नीम न मीठो होय, सींचो गुड़ घीव सूं।'

जिसके जो स्वभाव पड़ गए हैं, वे जाते ही नहीं हैं। जैसे नीम को कोई व्यक्ति गुड़ और घी से भी सींच दे, तब भी नीम तो खारा का खारा ही रहता है। काबा जाओ, काशी जाओ, गंगा में डुबकियाँ लगाओ। दिल का देवालय गंदा, तो फंदा सारा धर्म-कर्म है। चाहे जितनी डुबकियाँ लगाओ और चाहे जितने तीर्थ-धाम कर आओ, पर मन ही अगर गंदा है तो वहाँ जाकर भी तुम अपने जीवन में निर्मलता और पवित्रता का संदेश नहीं ला पाओगे। ऐसा नहीं है कि मरने के बाद उनका स्वभाव छूट जाता होगा। जिन लोगों ने अपने स्वभाव को बदलने के लिए प्रयास ही नहीं किया, वे मर भी जायेंगे, तब भी उसी स्वभाव पर ही अड़े हुए रहेंगे। जब स्वर्ग के दरवाजे पर कोई कबाड़ी पहुँच जाए और स्वर्ग के दरवाजे के भीतर प्रवेश करना चाहे तो संभव है कि देवलोक के चौकीदार उसे भीतर प्रवेश करने से रोक दें और पूछें कि 'तुम्हारे पास ऐसा कौन-सा सर्टिफिकेट है कि तुम स्वर्ग के रास्ते पर आ गए हो।' कबाड़ी कहेगा- 'मैंने जिन्दगी में चाहे जितना कबाड़ा किया हो लेकिन पाँच-दस पैसे का दान भी दिया होगा।