दिव्य विचार: प्रेम में ही सत्य की शक्ति निहित- मुनिश्री चन्द्रप्रभ जी महाराज
मुनिश्री चन्द्रप्रभ महाराज जी कहते हैं कि व्यक्ति को औरों के साथ ठीक वैसे ही प्रेम करना चाहिए जैसे कि वह अपने आप से करता है। प्रेम ही संसार का सबसे खूबसूरत भाव है। प्रेम स्वयं ही स्वर्ग का मार्ग और मुक्ति का द्वार है। प्रेम से ही जीवन का प्रारम्भ होता है और प्रेम पर ही जीवन पूर्ण होता है। प्रेम जीवन का परिणाम नहीं है वरन् जब जीवन में प्रेम का निर्झर फूटता है तभी वास्तविक जीवन की शुरूआत होती है। अगर दुनिया में प्रेम न होता तो सारी दुनिया वैर-विरोधों से भरी रहती और तब यह सौ वर्ष तो क्या, एक दिन भी जीने के काबिल न होती। क्या आप ऐसे घर में जाना चाहेंगे जहाँ आपकी मनुहार और सम्मान न हो ? क्या आप किसी ऐसे स्थान पर बैठना चाहेंगे जहाँ आपको फटकार मिलती हो। आँखों में चमक वहीं आती है जहाँ प्रेम मिलता है। जिह्वा तभी मधुर होती है जब उसमें प्रेम का रस घुलता है। हृदय तभी प्रफुल्लित होता है जब हृदय में प्रेम का गुलाब खिलता है। प्रेम ही जीवन की बारहखड़ी का पहला शब्द है। मनुष्य के जीवन में माधुर्य की शुरुआत प्रेम से होती है। प्रेम में ही सत्य की शक्ति निहित है। प्रेम में ही शिवत्व की आभा छिपी हुई है। सच तो यह है कि प्रेम से बढ़कर सौन्दर्य का कोई अस्तित्व नहीं है। व्यक्ति का प्रेम जब औरों के प्रति सम्मान से भर जाता है तो वह श्रद्धा बन जाता है। यही प्रेम जब विकृत होता है तो वैर-विरोध और क्रोध बन जाता है। जब प्रेम श्रद्धा में रूपांतरित होता है तो वह अपने शीश को औरों के पाँव में झुका देता है और जब वही प्रेम वैर-विरोध का रूप धारण कर ले तो उसकी जूती दूसरे के माथे पर भी पड़ सकती है। दुनिया में चलने वाली मैत्री प्रेम का ही विकसित रूप है। करुणा भी प्रेम का ही रूपांतरण है। भक्ति भी प्रेम की ही पराकाष्ठा है। प्रेम ही प्रणाम बनता है, प्रेम ही प्रसाद होता है और प्रेम ही आशीर्वाद बन जाता है। प्रेम जब किसी को सम्मान देना चाहता है तो प्रणाम बन जाता है। जब स्नेह से किसी के माथे पर हाथ रखते हो तो वह आशीर्वाद बन जाता है और जब किसी को प्रेमपूर्वक भोजन समर्पित करते हो तो वह प्रसाद बन जाता है।






