दिव्य विचार: पुरूषार्थ से मिलती है सफलता- मुनिश्री चन्द्रप्रभ जी महाराज

दिव्य विचार: पुरूषार्थ से मिलती है सफलता- मुनिश्री चन्द्रप्रभ जी महाराज

मुनिश्री चन्द्रप्रभ महाराज जी कहते हैं कि सफलता और कामयाबी व्यक्ति का मौलिक अधिकार है। यह व्यक्ति का जन्मसिद्ध और कर्मसिद्ध अधिकार है। धरती पर जितने भी लोग सफल हुए हैं, उनकी सफलता का मापदंड अवश्य ही यही रहा होगा। जिन लोगों को नाकामयाबी का सामना करना पड़ा है, उनकी असफलता के पीछे भी अवश्य ही उनके द्वारा होने वाली चूकें रही हैं। मनुष्य केवल किस्मत की बदौलत सफल नहीं होता और न ही बदकिस्मती के कारण असफल होता है। सच्चाई तो यह है कि किस्मत भी उन्हीं का साथ निभाती है जो पुरुषार्थ करते हैं। किसी भी मूल्यवान लक्ष्य की प्राप्ति के लिए किया जाने वाला श्रम और संघर्ष ही व्यक्ति की हर सफलता का आधार होता है। जिन लोगों के चेहरों पर खुशियाँ और जीवन में आत्मविश्वास दिखाई देता है, उन्होंने निश्चय ही अपनी जिन्दगी में कोई-न-कोई विशिष्ट कामयाबी हासिल की हुई होती है। जिन चेहरों पर नैराश्य, तनाव, घुटन के चिह्न दिखाई देते हैं, वे अवश्य ही अंदर से टूटे हुए और अपने जीवन-क्षेत्र में नाकामयाब हो गए हैं। हर सफलता अपने पीछे किसी-न-किसी असफलता को भी समेटे रहती है। यह जरूरी नहीं कि जो आज सफलता के शिखर पर दिखाई देते हैं, हमेशा से ही सफल रहे हों। हो सकता है, उन्हें भी कभी नाकामयाबी का सामना करना पड़ा हो। सफलता की मंजिल जिन रास्तों और सोपानों से गुजरती है, उसके हर सोपान पर विफलता का एक पड़ाव है। हो सकता है कि एक सफलता के नेपथ्य में सौ असफलताओं की कहानी छिपी हो। दुनिया में वे लोग कभी असफल नहीं होते जो सफल नहीं हो पाए। असफल तो वे हैं जिन्होंने सफलता के लिए कभी प्रयास ही नहीं किया। मुझे तो ऐसा भी लगता है कि जो असफल हुआ है, उसने कामयाबी के लिए केवल पन्द्रह प्रतिशत शक्ति ही लगाई है। जो अपनी जीवन-शक्ति का पचास प्रतिशत सफलता के लिए समर्पित करते हैं, वे ही सफल हो सकते हैं। सफलता के शिखर-पुरुष तो वे ही होते हैं जो अपने जीवन की सौ प्रतिशत शक्ति अपनी सफलता की प्राप्ति के लिए समर्पित कर देते हैं।