दिव्य विचार:विचार करें, मनुष्य जीवन क्यों मिला?- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

दिव्य विचार:विचार करें, मनुष्य जीवन क्यों मिला?- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि दुनिया के जितने भी बंधन है, उनसे आदमी कैद हो जाता है लेकिन आसक्ति का बंधन एक ऐसा बंधन है, जिसके कारण मनुष्य सारे जीवन केवल दौड़ता ही रहता है। उसे दौड़ना पड़ता है। सब दौड़ रहे हो कि नहीं दौड़ रहे ? बोलो... किसके लिए? लेकर जाने के लिए? क्या होगा? कुछ ले जाओगे?... तो फिर, किसके लिए? तुम जो एकत्रित कर रहे हो उसे ले जा नहीं सकते और जो ले जाया जा सकता है, उसे तुम पहचानते नहीं, उसके लिए तुम्हारा कुछ प्रयास नहीं। सन्त कहते हैं-इन ठीकरों का मोह तुम छोड़ो और जो ले जा सकता है, उसे उपार्जित करने की कोशिश शुरु कर दो। उसका प्रयास कर दो तो जीवन में कुछ कामयाबी होगी अन्यथा सब कुछ व्यर्थ होकर नष्ट हो जाएगा, कुछ भी साथ नहीं आएगा। इस मनुष्य जीवन को पाया है, थोड़ा थम कर विचार करो कि हमें यह मानव पर्याय क्यों मिली और मुझे क्या करना है? एक आचार्य ने मनुष्य पर्याय के उद्देश्य का बहुत सुन्दर उल्लेख करते हुए कहा- यह मनुष्य जीवन इसलिए नहीं मिला कि तुम परिवार-परिजन में ही खोकर रह जाओ, इस मनुष्य जीवन की प्राप्ति इसलिए भी नहीं हुई कि तुम रमणियों में रमते रहो, यह मनुष्य जीवन तुम्हें इसलिए भी नहीं मिला कि तुम केवल धन-पैसे में उलझकर रह जाओ; अपनी आत्मा का उद्धार करने के लिए, भवसागर से पार उतरने के लिए मनुष्य जीवन मिला है। इसका उपयोग करो नहीं तो सब व्यर्थ हो जाएगा। जिसे इसकी पहचान होती है, वह थमता है और जिसके अन्दर इसकी समझ नहीं होती, वह थककर मर जाता है। एक दिन क्या होगा? अपनी जिन्दगी से थक जाओगे और मर जाओगे। थकने के बाद तो क्या होता है? थकते हैं फिर पड़ते हैं, मरने का मतलब क्या है? पड़ जाना लम्बे समय के लिए, काम खत्म। सन्त कहते हैं- 'नहीं, थकने के पहले थमो, भागदौड़ से बचो। पर यह सब कब होगा? जब आसक्ति कम होगी तब।