दिव्य विचार: भोगवादी मनोवृत्ति से बाहर निकलो- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

दिव्य विचार: भोगवादी मनोवृत्ति से बाहर निकलो- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि आँखें तो हमारे पास हैं। लेकिन मैं उन आँखों की बात नहीं कर रहा हूँ। ये आँखें बाहर की आँखें हैं। ये केवल दृश्य जगत् का दर्शन कराती हैं। सन्त कहते हैं कि इस दृश्य जगत् से बड़ा एक जगत् और है, जो अदृश्य जगत् है। इस जगत् के एक बड़े हिस्से को हम देख रहे हैं लेकिन भीतर के जगत् का एक अंश भी हमारी दृष्टि में नहीं आ पा रहा है। तय मान करके चलना कि बाहरी जगत् भीतरी जगत् के सामने बहुत छोटा-सा है। बाहर के संसार का विस्तार बहुत सीमित है, पर भीतर का संसार असीम है और उस असीम संसार का दर्शन केवल वही कर पाता है जिसके अन्दर श्रद्धा की आँख होती है। वह आँख जो तुम्हें सत्य का दर्शन करा सके, वह आँख जो तुम्हें जीवन के यथार्थ का बोध करा सके। वह दृष्टि जो तुम्हें जीवन को सही ढंग से समझा सके। जीवन के प्रति सही समझ विकसित कर सके। उस दृष्टि की अभिव्यक्ति से ही जीवन के रूपान्तरण का क्रम प्रारम्भ होता है और उसी दृष्टि का नाम हमारे आचार्यों ने सम्यग्दर्शन कहा है। सम्यग्दर्शन यानि समीचीन दृष्टि, यथार्थ दृष्टि, जो चीज़ जैसी है उसे उस रूप में देखने की कला। आज हम जो देख रहे हैं, वह वैसा नहीं है जैसा हमें दिख रहा है। क्योंकि हमारी अपनी मान्यताएं, हमारी अपनी धारणाएं हैं। जब तक जीवन के लक्ष्य पर हमारी सही दृष्टि केन्द्रित नहीं होगी, तब तक हम आगे बढ़ेंगे कैसे ? कैसी होनी चाहिए हमारी दृष्टि ? और क्या बनी हुई है हमारी दृष्टि ? हमें इस पर विचार करने की आवश्यकता है। हम केवल बाहर-बाहर ही देखते हैं। हमारी सोच, हमारा चिन्तन और हमारी दृष्टि केवल पदार्थों पर केन्द्रित हो गई है। हमारी मनोवृत्ति भोगवादी बनी हुई है। हम केवल शरीर के स्तर पर जीने के अभ्यासी बन गये हैं। शरीर और जगत् से परे न तो हमें आभास है और न ही अहसास है। यह बड़ी ही उथली दृष्टि की अभिव्यक्ति है और जब तक हम अपनी इस दृष्टि को बदल नहीं लेते तब तक अपने जीवन का उद्धार नहीं कर सकते सन्त कहते हैं कि यह बात सही है कि तुम शरीर के आश्रित जी रहे हो, शरीर में जी रहे हो, पर तुम शरीर ही नहीं हो।