दिव्य विचार: गुणानुरागी दृष्टि अपनायें- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

दिव्य विचार: गुणानुरागी दृष्टि अपनायें- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि जो हम चाहेंगे वह हमें मिलेगा। गुणानुरागी दृष्टि अपनायें। गुणों को प्रोत्साहन देने से हमारे भीतर के गुण बढ़ते हैं और दोषों की तरफ दृष्टि रखने से हमारे भीतर का दूषण फैलता है। अब आप यह पूछ सकते हैं कि महाराज श्री ऐसा क्यों है ? किसी की कोई गलती हो जाये और हम उसे दूसरे को न बतायें तो इससे तो फिर बहुत गड़बड़ियाँ हो जायेंगी। दोषों को संरक्षण नहीं मिलेगा क्या ? दोषों का संपोषण नहीं होगा क्या ? ध्यान रखना, दोषों के संपोषण की बात यहाँ नहीं की जा रही है। दोषों के संशोधन की बात की जा रही है। तय है कि आप कहते हैं कि दूसरों की बुराई आप नहीं बतायेंगे तो गड़बड़ी नहीं फैलेगी ? तो बताकर भी आप उसे सुधार नहीं सकते हैं। आप किसी व्यक्ति की गलती को प्रेम से जितना जल्दी दूर कर सकते हो, उसे प्रचारित करके नहीं कर सकते हैं। अगर किसी को सुधारना है तो उसे एकान्त में बुलाकर उसकी गलती का अहसास कराओ। तुम्हारे आत्मीय व्यवहार से उसमें परिवर्तन की बहुत कुछ संभावनायें बन जायेंगी। यदि दस लोगों के सामने आप उसे अपमानित करोगे तो वह व्यक्ति उसे अपनी प्रतिष्ठा का मुद्दा बना लेगा। जिससे उसमें कभी सुधार की संभावना नहीं होगी। एक बेटा यदि सिगरेट पीता है और यदि उसे मालूम है कि पिता को इसकी जानकारी नहीं है तो उसके सुधार की गुंजाइश है, लेकिन जिस दिन उसे मालूम पड़ जाये कि मेरे घर वालों को इसकी जानकारी है तो हो सकता है कि वह सामने पीने में भी संकोच न करें। बुराई को दूर करना मूल लक्ष्य है, लेकिन बुराई को दूर करने की भी एक पद्धति है। आप अपने बेटे की किसी गलती को दस लोगों के सामने प्रकट करोगे तो उस बेटे पर उसका विपरीत असर पड़ेगा और उसी कार्य को यदि आप अकेले में बुलाकर समझाओगे और कुल की गरिमा का ध्यान कराओगे तो उस बेटे को अपनी गरिमा का अहसास होगा। बहुत संभव है कि वह उस बुराई को दूर कर दे। प्रेम से आदमी को बहुत अच्छे से बदला जा सकता है। तिरस्कार प्रताड़ना और अन्य माध्यमों से हम व्यक्ति को सुधार नहीं सकते हैं।