दिव्य विचार: विषयों की दौड़ में समय मत गंवाओ- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

दिव्य विचार: विषयों की दौड़ में समय मत गंवाओ- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि हमारे मनुष्य जीवन में चार पन हैं- बचपन, यौवन, प्रौढ़ावस्था और वृद्धावस्था। ये चारों पन हमें एक श्रेष्ठ अवसर के रूप में मिले हैं। सबसे पहला अवसर बचपन का है, जो रत्नों जैसा कीमती होता है, लेकिन कहते है-जब बचपन में गया तब रत्नों जैसा कीमती वक्त यूँ ही बिता दिया । जवानी मिली तो उसे घोड़े पर सवार होकर गुज़ार दिया। जवानी का जोश यूँ ही गँवा दिया। अर्थात् विषयों की घुड़दौड़ में ही हम अपना सारा समय बिता देते हैं और जीवन में सोने जैसा कीमती क्षण हमारे हाथ से निकल जाता है। इसके बाद व्यक्ति गृहस्थी में प्रवेश करता है। प्रौढावस्था आ जाती है, अपने साथ अपनी बीबी तथा बच्चों का भार भी आ जाता है। गृहस्थी में उलझता जाता है। वह छल्ला और कोई नहीं, गृहस्थी का छल्ला था। उस पर लिखा था- मुझे न छुएँ, अन्यथा उलझ जाऐंगे अगर उलझे तो सुलझकर ही जाएँ। अतः जो गृहस्थी से दूर हैं वे बचे हैं और एक बार जिसने हाथ डाला फिर जिंदगी भर उसे सलटाते हुए ही वह गुजर गया। हाथ एक बार जाने के बाद फिर नहीं निकलता । संत कहते हैं - बेहतर है, उसमें उलझो ही मत। और यदि कदाचित् उलझ गए हो तो उसे सुलझाने में दूसरे हाथ को मत उलझाओ। एक ही हाथ को उलझा रहने दो तथा दूसरे से जितना माल निकाल सको, निकाल लो। उसी में मालामाल हो जाओगे। जो गृहस्थी की उलझनों में उलझ कर रह जाते हैं वे कभी कल्याण नहीं कर पाते। ऐसी स्थिति में दूसरे हाथ को परमार्थ में लगाना चाहिए। जिससे उलझनों में उलझने का वक्त कम मिले, परमार्थ करने से तुम्हारा कल्याण हो जाएगा। चौथी अवस्था में बिस्तर । बुढ़ापावस्था में तो सारे समय सोए-सोए ही गुज़ारना पड़ता है। पंडित जगन्मोहनलाल शास्त्री बहुत अच्छी बात कहा करते थे- 'बूढ़े को अर्द्धमृतक क्यों कहते हैं?' उन्होंने कहा- मृतक को चार उठाते हैं और बूढ़े को दो। इसलिए वह अर्धमृतक है। वृद्धावस्था भी एक जर्जर अवस्था है। जहाँ मनुष्य चाहकर भी कुछ नहीं कर पाता, शरीर से शक्य नहीं रहता। शक्ति नहीं रहती, मन की भावनाएँ मन ही में रह जाती हैं।