दिव्य विचार: भटकाव का मूल कारण हमारा अज्ञान- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

दिव्य विचार: भटकाव का मूल कारण हमारा अज्ञान- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि आज तक के भटकाव का मूल कारण हमारे भीतर का अज्ञान है, तत्वबोध की कमी है। हमने सबको जाना, केवल अपने को नहीं जाना। वास्तविकता का ज्ञान प्राप्त नहीं किया। यह ज्ञान यदि प्रकट होने लगे तो ज्यादा कुछ समझाने की ज़रूरत नहीं होगी। जो जीवन की दुर्लभता को, जीवन के अनुकूल संयोगों को जानता है, जो यह जानता है कि यह सब चीजें पुण्य के फल से प्राप्त होती हैं, उस व्यक्ति को ज्यादा उपदेश देने की जरूरत नहीं पड़ती। क्योंकि जो चीज़ मूल्यवान् दिखती है उसकी सुरक्षा तो वह स्वयं ही कर लेता है। यह तो हमें मालूम है, जन्म-जन्मान्तरों का संस्कार है। इसके लिए ज्यादा प्रशिक्षण की ज़रूरत नहीं है। बोधि दुर्लभभावना का मूल मन्त्र यही है कि हम जीवन के मूल्य और महत्त्व को समझें। यह याद रखना, ज्ञान तो बहुतों को प्राप्त हो जाता है, ज्ञान प्राप्त होना अलग बात है और बोधि की प्राप्ति होना अलग बात है। इन दोनों में बड़ा अन्तर है। दुनिया में ज्ञानी जनों की कमी नहीं है। बहुत से ऐसे लोग मिलेंगे जो तुम्हें तुम्हारे जीवन के बारे में उपदेश दे देंगे, बड़ी-बड़ी बातें करेंगे, तुम्हें तुम्हारे जीवनदर्शन की सारी बातें बता देंगे। पर बन्धुओ ! वह केवल ज्ञान है, बोधि नहीं। ज्ञान ही बोधि के रूप में परिणत होता है, जब ज्ञान के साथ विरक्ति का भाव जुड़ जाता है। ज्ञान का मतलब है, सूचनाओं का संग्रह और बोधि का मतलब है आत्मबोध या विरक्ति का भाव । ज्ञान सहज है, बोधि दुर्लभ है । ज्ञानदुर्लभ भावना नहीं है। दुनिया में ज्ञानियों की कमी नहीं, आज तो दूसरों को ज्ञान बॉटने का व्यवसाय करने वाले बहुत से ज्ञानी लोग हैं। ज्ञान कल्याण का कारण नहीं है, बल्कि बोधि कल्याण का कारण है। सच्चा ज्ञान कौन है ? - सच्चा ज्ञान कौन है ? जिससे राग नष्ट हो और कल्याण के मार्ग के प्रति अनुराग हो। जिससे अन्दर मैत्री की भावना विकसित हो, वही ज्ञान महावीर के शासन में ज्ञान कहा जाता है। बाकी तो केवल दिमागी बोझ हैं। दिमागी बोझ रखने वाले लोग बहुत हैं। हर बात में अपनी बुद्धि को ले जाते हैं, लेकिन पाते कुछ भी नहीं हैं। उनका सारा जीवन तर्क-वितर्क और ऊहापोह में ही बीतता है।