दिव्य विचार: जीवन को यूं ही नष्ट न होने दें- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि बन्धुओ ! आपको उस व्यक्ति की नादानी पर हँसी आ रही होगी, लेकिन वस्तुतः किसी दूसरे पर हँसने जैसी बात नहीं है। यह उस व्यक्ति की नादानी नहीं वरन् हर उस व्यक्ति की नादानी है जो अपने जीवन के प्रति लापरवाह है। संत कहते हैं - तुम्हें यह जो मनुष्य जन्म मिला है वह रत्नों की पोटली की भाँति है। जो एक-एक श्वॉस बीत रही है, वह तुम्हारे द्वारा फेंके गए एक-एक रत्न के समान है। अपनी कीमती श्वॉस को समझो, उसे यूँ ही व्यर्थ मत जाने दो। उसका सदुपयोग करो। उसकी दुर्लभता का अहसास करो। तब तुम अपने जीवन में कुछ कर पाओगे। तब तुम्हारे जीवन में कुछ घटित हो सकेगा। अन्यथा तुम्हारा जीवन यूँ ही नष्ट-भ्रष्ट हो जाएगा । संत कहते हैं विचार करो, कि कितनी कठिनाई से तुमने यह मनुष्य जन्म पाया है। यह विचारो कि यह मनुष्य जन्म क्यों पाया ? क्या जीवन का उद्देश्य केवल मौज-मस्ती या आमोद-प्रमोद है ? यदि इस मौज-मस्ती को ही अपने जीवन का ध्येय बनाना चाहते हो तो यह तो ऐसा ही है जैसे कंचन को तुमने काँच के भाव बेच दिया। कीमती जीवन को गँवाना तो ऐसा है जैसे राख के लिए चंदन को जला दिया। इससे बड़ी नादानी और क्या होगी ? संभलो, समझो, अपने जीवन को परिवर्तित करने का प्रयास करो। जीवन का उद्देश्य जीवन का कल्याण होना चाहिए। यह मनुष्य जन्म किसलिए धारण किया ? मनोहर स्त्रियों के रमणीय भोगों में रमने के लिए ? नहीं। परिवार, परिजन, संपत्ति के विकास के लिए ? नहीं। धन- सम्पदा कमाने के लिए ? नहीं। किसलिए ? किन्तु आत्मोद्धारणाय जन्मजलधेः इस संसार समुद्र से आत्मा के उद्धार के लिए जन्म लिया है। इसके अलावा और कोई दूसरा उद्देश्य नहीं है। इस उद्देश्य को समझिए, यह परम उद्देश्य है और यह कितनी कठिनाई से पाया है इसको समझिये ! हमने जितनी दुर्लभता से जीवन को पाया है, उतनी ही सहजता से इसे खो रहे हैं। बाकी चीजें खो जाती हैं तो तकलीफ होती है और जीवन खो जाता है तो कोई तकलीफ नहीं होती। क्योंकि जीवन के मूल्य को ही हमने नहीं समझा।






