दिव्य विचार:जैसा करोगे, वैसा ही अंजाम होगा- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि देखो जीवन में कैसी अनुभूति होती है। कैसा आनन्द आता है। जीवन की दशा और दिशा अपने आप परिवर्तित हो जाती है। एक छोटी-सी कहानी याद आ रही है। एक बार एक आदमी मरा और वह मरकर यमराज के पास पहुँचा। चित्रगुप्त ने पूछा कि आये हो तो बताओ स्वर्ग जाना चाहते हो कि नहीं ? जिन्दगी में कोई अच्छा काम किया या नहीं। उसको कुछ याद ही नहीं। सारी ज़िन्दगी पाप करता रहा, कुकर्म करता रहा। तो उसको केवल कुकर्म ही याद थे। अच्छा काम करने का कोई स्मरण ही नहीं था। पूछा- भाई कोई अच्छा काम याद करके बताओ। हम तुम पर दया करके तुम्हारी व्यवस्था बना देंगे। एकाध भी अच्छा कार्य किया हो तो स्वर्ग भेजने की बात सोचेंगे। बहुत देर के बाद वह बोला मैने एक भिखारी को चवन्नी दान दी थी। पूछा --चवन्नी कहाँ से आई थी ? वह बोला एक की अठन्नी चुराई थी। चित्रगुप्त बोले - तो जाओ नरक में। अठन्नी चुराकर चवन्नी दान में देने वाला नरक में नहीं जायेगा तो कहाँ जायेगा ? ज़िन्दगी भर कुकर्म करोगे तो उसका फल तो भोगना ही पड़ेगा । इसलिये सम्यग्दृष्टि धर्मात्मा तो इस विश्वास में चलता है कि आज मैंने अच्छा काम किया है तो परिणाम भी अच्छा होगा, अच्छे काम का परिणाम सदैव अच्छा होता है। लेकिन क्या करें ? आज के लोग हैं कि बुरा करने से चूकते नहीं और बुरे अंजाम से बचना चाहते हैं। जो करोगे अंजाम तो वही होगा। बुरे अंजाम की बात मत सोचो, बुरे काम करने से बचो। बुरे काम छूटेंगे तो बुरा अंजाम होगा ही नहीं। अच्छे काम का अच्छा अंजाम और बुरे काम का बुरा अंजाम । कल की चिन्ता में खो दिया आज जो इस काम को जानता है वह कभी परलोक की चिन्ता नहीं करता है। यह भी एक दुर्बलता है । चिन्ता करने से परलोक बिगड़ेगा, सुधरेगा नहीं। हाँ, परलोक सुधारने का भाव मन में हो, तो अपने जीवन को सुधारने की कोशिश करो। इहलोक को सुधारोगे तो परलोक अपने आप सुधर जायेगा। मैं देखता हूँ कि बहुत सारे लोग परलोक सुधारने के चक्कर में तो लगे रहते हैं पर इहलोक सुधारने की कोशिश भी नहीं करते हैं।






