दिव्य विचार: हर संयोग वियोगमय होता है- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

दिव्य विचार: हर संयोग वियोगमय होता है- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि हर संयोग वियोगमय हैं। संयोग के साथ वियोग जुड़ा हुआ है। चाहे कोई कितना इष्ट क्यों न हो ? चाहे कोई कितना अनुकूल क्यों न हो ? उनकी चिन्ता में मैं पागल हो जाऊँगा, लेकिन पाऊँगा कुछ भी नहीं। यह इष्ट-वियोग, अनिष्ट-संयोग की स्थिति निरन्तर बनती रहती है। आदमी उसको देखकर चले तो उसके जीवन की दिशा कुछ और हो सकती है। सन्त कहते हैं कि इष्ट का वियोग हो जाये और इष्ट के वियोग में जो उसके मन में व्याकुलता होती है वह एक अज्ञानी की पहचान है। ज्ञानी यही जानकर चलता है कि मेरे साथ जिसका जितने दिन का संयोग था, बना रहेगा। जब तक कर्म के अनुकूल संयोग हैं, कोई भी मेरा बाल बाँका नहीं कर सकता। और कर्म के प्रतिकूल संयोगों के होने पर चाहे कितना भी करूँ, जो मेरा इष्ट है वह भी अनिष्ट बन जाता है। इसलिये मैं इससे प्रीति क्यों करूँ ? इष्ट का वियोग, अनिष्ट का संयोग । अब कोई अनिष्ट योग हो गया। अब क्या करें ? पति हैं तो शराबी हैं। खराब नेचर का है, निकम्मा है, रात-दिन चिल्लाता रहता है। अब हे भगवन् ! इससे कैसे बचें ? यह मेरे पल्ले में कैसे पड़ गया ? मैंने कौन- पाप किया था ? माँ-बाप ने न जाने किसके साथ मुझे बाँध दिया। कैसे पाप कर्म का उदय है। रात-दिन ऐसी चिन्ता से व्याकुल होने से क्या मिलेगा ? अब तो जो होना था सो हो गया, उसको निभाने में ही सार है। एक ज्ञानी जीव सोचता है कि यदि ऐसा मेरे साथ हुआ है तो यह मेरे कर्म का उदय है। मुझे यह भी स्वीकार है। और अज्ञानी जीव उसे दूर करने की चिन्ता में रात दिन उसे कोसता रहता है। अब किसी की पत्नि यदि गलत स्वभाव वाली है तो उसे दिन-रात पत्नि के स्वभाव को लेकर चिन्ता रहेगी। क्या होगा ? कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं, जो निभा भी नहीं पाते और छोड़े भी नहीं जाते। क्या करोगे ? जब निभाना तुम्हारी नियति है, तो रो-धोकर निभाने की अपेक्षा प्रसन्नता से निभाओ। तुम्हारे जीवन की दिशा ही कुछ और हो जायेगी और तुम्हारे जीवन में अलग ही आनन्द की अनुभूति होगी।