दिव्य विचार: जो होता है वह अच्छा ही होता है- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

दिव्य विचार: जो होता है वह अच्छा ही होता है- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि दूसरा है परलोकभय । मैं परलोकभय के दो अर्थ लेता हूँ - एक अर्थ यह है कि परलोक जाऊँगा तो क्या होगा और दूसरा अर्थ यह है कि कोई प्राणी मुझे न सतायें। कोई पशु-पक्षी मुझे न मार दे। देवों के द्वारा मुझ पर आक्रमण न हो जाये। किसी दूसरे व्यक्ति के द्वारा कोई नुकसान न पहुँच जाये। इस तरह की अनेक चिन्तायें मन में उत्पन्न होती रहती हैं। भैया, दूसरा तो निमित्त है, उपादान तो मैं स्वयं हूँ। यदि कोई मेरे साथ कुछ अहित भी करता है तो उसका जबावदार तो मैं स्वयं हूँ, उसका भागीदार भी मैं हूँ। कर्म तो मेरे कार्य में आड़े आते हैं। वह तो केवल निमित्त हैं। अज्ञानी निमित्त की तरफ देखता है और ज्ञानी निमित्त की तरफ न देखकर उपादान की तरफ देखता है। मैं किसकी चिन्ता करूँ ? जो जब जैसा होना होता है वह वैसा ही होता है और जो होता है सब अच्छे के लिये होता है। ये दो बातें अपने दिल-दिमाग में बैठा लें। अर्थात् चिन्ता करने की कोई ज़रूरत नहीं होगी। ठीक है झेलना तो पड़ ही रहा है। ये कुछ ऐसी ही दृष्टियाँ है जिनको आप आत्मसात् कर लो तो तमाम प्रकार की प्रतिकूलताओं में भी आप अपने मन की प्रसन्नताओं को टिकाये रखने में समर्थ हो सकोगे। चोरी के पैसों से दान ? तू बनना चाहता महान मैं परलोक जाऊँगा तो मेरा क्या होगा ? यह चिन्ता ? अरे जो यहाँ किया, वही वहाँ मिलेगा। परलोक की चिन्ता क्यों करें ? दो प्रकार के विद्यार्थी होते हैं - एक विद्यार्थी होता है जो साल भर पढ़ता नहीं है और परीक्षा के बाद रिजल्ट के प्रति चिन्तित रहता है। पता नहीं कि मैं पास होऊँगा कि फैल। सालभर पढ़ा नहीं, तो चिन्ता ही करनी पड़ेगी। पढ़ा नहीं और पेपर दे आये तो पास होऊँगा या फेल, यही सोचना होगा। जबकि दूसरा लड़का वह है जो सालभर मेहनत करता है, पढ़ाई करता है और परीक्षा देकर आता है और रिजल्ट खुद घोषित कर देता है, कि मैंने पेपर ऐसा किया है तो इतने नम्बर मिलेंगे। उसे चिन्ता की कोई ज़रूरत नहीं होती। इसी तरह जो व्यक्ति जिन्दगी भर सत्कर्म करता है उसे परलोक की चिन्ता करने की ज़रूरत नहीं होती है और दुष्कर्म करने वाला चाहे कितना भी भयभीत क्यों न हो उसे कष्ट तो भोगना ही पड़ेगा।