दिव्य विचार: राग-द्वेष से जितना हो सके, दूर ही रहें- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

दिव्य विचार: राग-द्वेष से जितना हो सके, दूर ही रहें- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि आज तुम्हारे अन्दर समझ जगी है तो कम से कम सही समझ जाओ। अब तो अपने रास्ते को ठीक ढंग से अपना लो। सम्यग्दृष्टि सन्मार्ग का उपासक होता है। उसने सन्मार्ग को एक बार में ही पहचान लिया तो फिर दूसरे मार्ग की तरफ उसकी दृष्टि ही नहीं होती है। मैने एक बार पंचगुरुओं की शरण को प्राप्त कर लिया है। अब मुझे किसी की ज़रूरत नहीं है। कुमार्ग पर चलने वाले लोगों को देखकर न उनकी प्रशंसा करना और न उनकी निन्दा करना इसी का नाम अमूढ़दृष्टि है। मैंने जो एक मार्ग पकड़ लिया यही सच्चा मार्ग है। बाकी सब का सब झूठा है। मुझे उनसे कोई सरोकार नहीं है। मैं इसी मार्ग से अपनी मंजिल तक पहुँचूँगा और केवल यही मार्ग हमें हमारी मंजिल तक पहुँचा सकता है। इस दृढ़ धारणा का नाम अमूढ़दृष्टित्व है। इसके अलावा और कोई मार्ग नहीं है। लेकिन कुछ ऐसे भी लोग हैं जो अपने मार्ग से बहुत जल्दी भटक जाते हैं। दुनिया में बहुत सारे ऐसे लोग हैं कि गंगा गये तो गंगादास और जमुना गये तो जमुनादास। जिनकी अपनी कोई एक सुनिश्चित धारणा नहीं। ऐसे लोग अपना कल्याण नहीं कर सकते हैं। मेरा कल्याण किसमें है इसे समझो। हम किसका कल्याण करना चाहते हैं? हम धर्म की आराधना कर रहे हैं तो हमारी धर्माराधना का मूल उद्देश्य क्या है ? अपने इस संसार परिभ्रमण को रोकना। संसार परिभ्रमण को तभी रोका जा सकता है, जब हम बन्धन से बचेंगे और बन्धन तभी दूर होगा जब हम बन्धन के कारणों को जान सकेंगे। बन्धन के कारण हैं रागद्वेष। हम राग और द्वेष के चक्कर में जन्म-जन्मान्तरों से फंसे हुए हैं। उस रागद्वेष को हम दूर करेंगे तभी हम अपने स्वरूप को प्राप्त कर सकेंगे। हम किसकी उपासना करें? जो रागद्वेष में जी रहा है उसकी ? या जिसने रागद्वेष को जीत लिया है उसकी ? रागद्वेष में जीने वाले की उपासना करोगे तो संसार में भटकते रहोगे। क्योंकि जो खुद मझधार में डूब रहा है वह तुम्हे कैसे तार सकता है।