दिव्य विचार: धर्म की प्रभावना का प्रयास करो- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज
मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि तपस्या करके धर्म की प्रभावना का प्रयास करो। महान् मुनियों की तपस्या को देखकर, उनकी कठोर चर्या को देखकर लोग प्रभावित होते हैं। यह प्रभाव तपस्या से होता है, महान् तपस्या से । तपस्या के क्षेत्र में मुनिराजों को सबसे बड़ा श्रेय जाता है। मेरे सम्पर्क में रीवा विश्वविद्यालय के कुलपति थे ए.डी.एन. वाजपेयी, वह ब्राह्मण थे लेकिन जैन धर्म का पूरी तरह पालन करते थे। उन्होंने एक दिन बड़ी गजब की बात कह दी। उनकी बात थी तो कटु, लेकिन बहुत विचारणीय थी। उन्होंने कहा- मैं जैन धर्म से प्रभावित हूँ लेकिन जैनियों से नहीं। कितनी बड़ी बात हो गई। हमारे धर्म का आदर्श तो बहुत अच्छा है, लेकिन धर्मी? उस तरफ दृष्टि ही नहीं। जैन धर्म से प्रभावित हूँ, जैनियों से नहीं और अगर पुनर्जन्म हो तो मैं जैन धर्म में जन्म लेना चाहूँगा, यह भी कहा उन्होंने। हम कहाँ हैं? फैलाओ, जहाँ कहीं धर्म प्रभावना का अवसर आए, दान में मत चूको। पुण्य के लोभ में ही नहीं, धर्म की यह परम्परा आगे भी चलती रहे। क्योंकि जैसे मैंने अनन्त भवों तक दुःख भोगा, वैसे किसी दूसरे को न भोगना पड़े। मेरे सम्पर्क में एक व्यक्ति हैं, बहुत दानशील हैं। उन्होंने कई जगह दान दिया। वह कहते हैं महाराज ! धर्म प्रभावना में मेरा दान लगे तो इससे अच्छी बात क्या हो सकती है। दातार तो बहुत मिले, जिनसे लोगों ने रिक्वेस्ट किया, उन्होंने पैसा भेजा, लेकिन वह एक ऐसा दातार है जो बैंक से स्टेटमेण्ट पता कर-करके जब-जब पैसों की कमी हुई, वहाँ उसने दान बोला, भेज दिया। दो-तीन प्रोजेक्ट्स को ऐसे लिया, पता लगाया, उनसे जुड़ा, बोला- महाराज ! धर्म प्रभावना का काम है। इस कार्य में मेरा पैसा लगेगा, मैं अपने आपको कृतार्थ महसूस करूँगा और वहाँ के व्यवस्थापक आकर बोलते हैं- महाराज ! वे खुद पता करते हैं कि बैंक में स्टेटमेण्ट क्या है और जहाँ कम हुआ, वहाँ डाल देते हैं। यह धर्म-प्रभावना की भावना है। ऐसे व्यक्ति से लोग प्रभावित होते हैं। वैभव के शिखर पर बैठा है, पर सरलता की मूर्ति हैं। नाम मैं ले सकता हूँ, लेकिन उनका कहना है कि नाम लोगे तो मैं परेशान हो जाऊँगा।






