दिव्य विचार: जहां विश्वास वहां संदेह नहीं होता- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

दिव्य विचार: जहां विश्वास वहां संदेह नहीं होता- मुनिश्री प्रमाण सागर जी महाराज

मुनिश्री प्रमाण सागर जी कहते हैं कि निःशंकित अर्थात् शंका का अभाव। शंका दो अर्थों में प्रयुक्त होती है - शंका का एक अर्थ है संदेह और दूसरा अर्थ है भय । सम्यग्दृष्टि धर्मात्मा जीव तत्त्व का सच्चा श्रद्धानी बन जाने के बाद उसके मन में किसी भी प्रकार का संदेह शेष नहीं बचता। किसी भी प्रकार का भय उसके मन में व्याप्त नहीं होता। वह भय और संदेह से मुक्त जीवन जीता है। वस्तुतः वह परम विश्वास का धनी होता है। जहाँ विश्वास होता है, वहाँ संदेह नहीं होता। और जहाँ सदेह होता है, वहाँ विश्वास नहीं होता। दोनों चीजें एक साथ पनप नहीं सकती हैं। घर-परिवार में आप देखते हैं कि जिस व्यक्ति के प्रति आपका विश्वास होता है उसके प्रति किंचित् भी संदेह नहीं करते हैं। आप बेफिक होकर अपने घर के कैश की चाबी उसे सौंप देते हैं। जिस व्यक्ति के प्रति तनिक भी सदेह होता है वह आदमी कितना भी गुणी क्यों न हो, उसके प्रति विश्वास नहीं कर पाते हैं। दोनों परस्पर भिन्न या विरोधी चीजें हैं। जहाँ विश्वास है वहाँ संदेह नहीं, जहाँ संदेह है वहाँ विश्वास नहीं । धर्म की शुरूआत श्रद्धा से होती है। श्रद्धा में संदेह का कोई स्थान ही नहीं। शंका के होते श्रद्धा उत्पन्न ही नहीं हो सकती। ध्यान रखना बन्धुओ, शंका की धरती पर कभी श्रद्धा के बीज अंकुरित नहीं हो सकते हैं। जहाँ शंका होगी वहाँ श्रद्धा प्रस्फुटित नहीं होगी। इसलिये जहाँ श्रद्धा है वहाँ विश्वास है, वहाँ समर्पण है, वहाँ शंका का अभाव है। और जहाँ शंका है, वहाँ श्रद्धा का अभाव है। दोनों कभी साथ-साथ चल ही नहीं सकते हैं। यह सम्यग्दृष्टि की पहली विशेषता के अन्तर्गत कहा गया है कि वह निःशंक होता है। उसके मन में किसी भी प्रकार का संदेहमूलक भाव नहीं होता है। उसको शंका नहीं होती है। यानी न तो संदेह होता है और न भय। मैं दोनों की बातें आपसे करूँगा। सबसे पहले चर्चा श्रद्धा की कर लूँ, फिर भयमुक्त स्थिति के विषय में चर्चा करूँगा ।एक धर्मात्मा व्यक्ति जो जीवन के लिये नई दिशा तय करता है उसके जीवन में श्रद्धा क्रियात्मक होती है। वह किस तरह से अपनी भयजन्य दुर्बलताओं को दूर करने में समर्थ होता है, और अपने जीवन को आगे बढ़ाता है।