दिव्य विचार: हीन भावना त्यागकर सफलता की राह पकड़ो- मुनिश्री चन्द्रप्रभ जी महाराज

दिव्य विचार: हीन भावना त्यागकर सफलता की राह पकड़ो- मुनिश्री चन्द्रप्रभ जी महाराज

मुनिश्री चन्द्रप्रभ महाराज जी कहते हैं कि चित्त के बोझों को उतारने के लिए हीन-भावना को निकाल फेंकिये। हीन-भावना से ग्रसित होने की बजाय आप अपने भीतर सफल होने का विश्वास अर्जित कीजिये। अपने भीतर सफलता की कामना संजोइये। आप यह न सोचें कि आप में क्षमता नहीं है। असल में आपके अन्दर असीम क्षमता है, आवश्यकता केवल उसके विकास की है। ऐसा कौन-सा कार्य है जिसे हम न कर सकें? उद्यमशीलता से सब कुछ सम्भव है। स्वयं को हीन भावना से मुक्त रखें। रूप, रंग, वर्ण, जाति, धन किसी भी कारण से स्वयं को हीन महसूस न करें। हीनता की ग्रंथि और अहंकार की ग्रंथि दोनों समान रूप से घातक हैं। विकलांगता भी सर्वांगीण विकास में बाधक नहीं बन सकती अगर आपके भीतर अदम्य उत्साह और कुछ कर गुजरने की आकांक्षा है। आज या किसी भी समय में जो शिखर-पुरुष हुए हैं या जिन्होंने कुछ कर दिखाया है, वे अपने जीवन के प्रारम्भिक काल में अत्यन्त संघर्षशील रहे हैं। सोना आग में तपकर ही कुंदन बनता है। लाल बहादुर शास्त्री गरीब किसान परिवार के पुत्र थे जो नदी तैरकर पढ़ने के लिए इलाहाबाद जाया करते थे, वे भारत के दूसरे प्रधानमंत्री बने। अब्राहम लिंकन भी गरीब परिवार से थे किन्तु जीवन में बार-बार असफल होने पर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अंततः वे अमेरिका के राष्ट्रपति-पद पर आसीन हुए। हमारे देश के कवि सूरदास नेत्रहीन होते हुए भी अमर गीतों की रचना कर गये। आज के युग में, संगीतकार रवीन्द्र जैन ने नेत्रहीनता के उपरान्त श्रेष्ठ संगीत का सृजन किया है। डॉ. रघुवंश सहाय हाथों से विकलांग है किन्तु उन्होंने श्रेष्ठ साहित्य की रचना की है। तात्पर्य यह कि विकलांगता या निर्धनता किसी के विकास में बाधक नहीं है। बाधा तो यही है कि वह स्वयं को छोटा, नीच, हीन और गरीब मान लेता है। कृपया अपने विश्वास को छोटा मत होने दीजिए। रंग, जाति भले ही हलके हों, पर अपने हृदय को हीन मत होने दीजिए। मन को सुन्दर बनाइए। जीवन को श्रेष्ठ बनाइये। रोजगार कमाना कोई बड़ी बात नहीं है।