दिव्य विचार: प्रकृति के साथ चलना सीखो- मुनिश्री चन्द्रप्रभ जी महाराज
मुनिश्री चन्द्रप्रभ महाराज जी कहते हैं कि जो प्रकृति को, उसके गुणधर्म को धैर्यपूर्वक समझ लेता है, वह चिंता और जीवन की उठापटक से आंदोलित नहीं होता। यदि प्रकृति पर विश्वास करोगे तो प्रकृति भी तुम्हे सहयोग देगी और तुम्हारे लिए रास्ता खोलेगी। सूरज आज पश्चिम डूब गया तो क्या हुआ ! धीरज धरो। प्रकृति पूर्व की गोद में फिर सूरज का उपहार भर देगी। जो व्यक्ति प्रकृति के जितना करीब रहता है, वह उतना ही सहज और चिंतामुक्त जीवन जी लेता है। मैं आपको अपनी विचारधारा और मानसिकता को प्रकृति के अनुरूप बनाने की प्ररेणा दूंगा। मैं सुखी हूं इसलिए कि मैं प्रकृति का पुजारी हूँ। प्रकृति मेरा हिस्सा है और मैं प्रकृति का। भला जब जन्म उसी ने दिया है तो मृत्यु भी उसी के दिये आएगी। दोनों ही जब इतने सहज हैं तो जीवन को फिर हम असहज क्यों बनाएँ? असहजता व्यक्ति को प्रपंची बनाती है और अतंर्मन का अंर्तद्वंद देती हैं। तुम निश्चिंता का कमल खिलाओ। तन-मन से तथा उसके गुणधर्मो से सदा कमल की तरह ऊपर उठने की, ऊपर खिलने की, ऊपर जीने की अलख जगाओ। तुम चिंता नहीं, चिंतन करो। चिंता अपील की होती है और चिंतन वर्तमान का होता हैं। चिंतन का तो परिणाम निकलता है किंतु चिंता स्वास्थ्य को, शरीर को खत्म कर देती है। चिंतन से समाधान होता है, चिंता मानसिक अवसाद देती है, चिंता का परिणाम घुटन, तनाव और अनिद्रा हैं। चिंता ऐसा लगता है जैसे किसी ने जीते जी चिता में डाल दिया हो। कहने को तो मात्र एक बिंदु का ही फर्क है लेकिन यथार्थ में कोई फर्क नहीं है, क्योंकि आदमी दोनों में जल रहा है। चिंता में व्यक्ति गीली लकड़ी की तरह धीरे-धीरे जलता ही रहता है जबकि चिंता कम-से-कम एक ही बार में राख तो कर देती है। चिंता लिक्विड ऑक्सीजन में पड़े हुए व्यक्ति की तरह है। ऑक्सीजन मरने नहीं देता और लिक्विड जीने नहीं देता।






